क्या वो देवी है? अवतार है?

क्या वो देवी है? अवतार है?
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वही धरा है, वही धाम है।
वही है दुर्गा, वही सतनाम है।

माँ के आँचल में ममता की छांव है,
स्नेह, प्यार, दुलार और क्षीरसागर है।

पत्नी प्रेमिका की आँखों में,
दुनिया जहाँ का सुकून है।

वो बेटी के रूप में माथे का तिलक है,
वो भाई की कलाई  पर रक्षा का संदेश है।

घर है स्वर्ग, इन देवियों का वास यहां होता है,
वनमानुष से तराश तराश इंसान यहां होता है।

एक अबोध बालक से पूछो उसके माँ की शक्ति,
तीनों लोकों में मानेगा सबसे बढकर वो भक्ति।

स्त्री घर का सूर्य है, और है घर की धूरि,
बन्दर को इंसान बनाये, उसी में जन्नत पूरी।

ये शब्दों का जाल नहीं है, नहीं है कोई छलावा,
मनभावन इस देवी पर, अपना मन भर आया।

इस देवी को पत्थर में, भगवान बना देते हैं,
घर में, चार दीवारी में अबला इंसान बना देते हैं।

सड़क से संसद तक, मंदिर से लेकर गांव तक,
इस देवी को रोज रोज लहूलुहान किया जाता है।

उस नारी से पूछो, क्या वो देवी है? अवतार है?
राक्षस जिसपे रोज करते हजारों अत्याचार है।

आज दिवस है उनका, उनको दंडवत प्रणाम है,
घर मंदिर और उस धुरी को प्रेम सहित सलाम है।

©बिहारी चौपाल

http://www.arunbharti.wordpress.com

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