कट्टरपंथी फूल

कट्टरपंथी फूल
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लोग
जब ज़िंदा होते हैं
तुम तब भी उनमें
हिन्दू और मुसलमान
ढूंढते हो

लोग
जब लाश बन जाते हैं
तुम तब भी उनमें
हिन्दू और मुसलमान
ढूंढते हो।

मैं
जब तक जिंदा हूँ
लोगों में
केवल और केवल
इंसान ढूंढता हूँ।

यही अंतर है
तुम में और मुझ में।
मैं इंसान गिनता हूँ
और तुम धर्म।

यहीं से
तुम्हारे और मेरे बीच
एक दीवार
खींच जाती है।

तुम्हारे आंगन में
कट्टरता के फूल उगते हैं।
उन्हें सुबह से शाम तक
तुम कई तरह का
पानी और खाद देते हो।

तुम्हारे टीवी से
सोशल मीडिया से
व्हाट्सऐप से
वह खाद और पानी
आता है।

यहीं पर हैं
तुम्हारे शाखा बाबू,
और मुल्ला मौलवी
और तुम्हारे प्रिय नेता
और तुम्हारा प्रिय पत्रकार
और तुम्हारा मित्र।

यही तुम्हें
सुबह से शाम
रात में सोने पर भी
एक कट्टर घूंट
पिलाते हैं।
और देते हैं,
खाद पानी।

तुम्हारी दुनिया
कितनी अलग है।
तुम पंडित और
पठान ढूंढते हो।

और मैं मीठा
शहद लेकर
इंसान ढूंढता हूँ।

तभी एक बस्ती जलती है
और एक बच जाती है।

@कॉपीराइट

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