Why do we celebrate GOOD FRIDAY

Good Friday is observed to commemorate the crucifixion of Jesus Christ and his death at Calvary. It’s a solemn day in the Christian calendar, marking the sacrifice believed to have redeemed humanity’s sins. The term “Good” refers to the day’s sacredness and its spiritual significance — not that the events were joyful.

Historically, it’s rooted in early Christian tradition and has been observed since at least the 4th century. It falls on the Friday before Easter Sunday, as part of the Holy Week.

Though not universally a public holiday in India, states like Kerala, Goa, and Nagaland observe it officially due to significant Christian populations.

From a sociological angle, the ritual of mourning, silence, and prayer on Good Friday symbolizes collective memory, grief, and hope — key elements in any community’s cultural and moral fabric.

क्या वो देवी है? अवतार है?

क्या वो देवी है? अवतार है?
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वही धरा है, वही धाम है।
वही है दुर्गा, वही सतनाम है।

माँ के आँचल में ममता की छांव है,
स्नेह, प्यार, दुलार और क्षीरसागर है।

पत्नी प्रेमिका की आँखों में,
दुनिया जहाँ का सुकून है।

वो बेटी के रूप में माथे का तिलक है,
वो भाई की कलाई  पर रक्षा का संदेश है।

घर है स्वर्ग, इन देवियों का वास यहां होता है,
वनमानुष से तराश तराश इंसान यहां होता है।

एक अबोध बालक से पूछो उसके माँ की शक्ति,
तीनों लोकों में मानेगा सबसे बढकर वो भक्ति।

स्त्री घर का सूर्य है, और है घर की धूरि,
बन्दर को इंसान बनाये, उसी में जन्नत पूरी।

ये शब्दों का जाल नहीं है, नहीं है कोई छलावा,
मनभावन इस देवी पर, अपना मन भर आया।

इस देवी को पत्थर में, भगवान बना देते हैं,
घर में, चार दीवारी में अबला इंसान बना देते हैं।

सड़क से संसद तक, मंदिर से लेकर गांव तक,
इस देवी को रोज रोज लहूलुहान किया जाता है।

उस नारी से पूछो, क्या वो देवी है? अवतार है?
राक्षस जिसपे रोज करते हजारों अत्याचार है।

आज दिवस है उनका, उनको दंडवत प्रणाम है,
घर मंदिर और उस धुरी को प्रेम सहित सलाम है।

©बिहारी चौपाल

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नाज़ुक मन

ऐसे तो वक़्त कटता नहीं,
लेकिन मन बहला लेता हूँ।

तुम जाती हो जब कहीं दूर,
कई तरह का खाना बना लेता हूँ।

इस बार पांच दिन में पांच सब्जी बनाया,
बैगन भर्ता, मिक्स वेग, एग करी,आलू टमाटर,
और कढ़ाई पनीर में समय गंवाया ।

लोग कहते हैं कि बीबी मायके गयी है,
बढ़िया है, बैचलर लाइफ एन्जॉय करो।

उन्हें क्या बताऊँ, की उसके बिना तो,
नींद और सांस दोनों में तक़लीफ़ होती है।

मेरी कविता व्यावहारिक है,
और प्यार अनोखा ताजा है।

तुमसे कहता हूँ जल्दी आओ,
नाजुक मन का तकाजा है !

©अरुण भारती

ये कौन सा अंधड़ हो तुम तुम्हारे वेग में यूँ खो रहा हूँ

ये कौन सा अंधड़ हो तुम तुम्हारे वेग में यूँ खो रहा हूँ
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संग चलने से बड़ा संगीन कुछ होता नहीं
एक मत होने से और रंगीन कुछ होता नहीं.
जो चलूँ संग हाथ थामे सहस्त्र नजरे सवाल पूछें
जो नजर भर देख लें समाज में बवाल गूंजे

भ्रम का बंधन बेड़ियों में लोग कुंठित हो रहे
रिश्तों के चिथड़ों समेटे सभ्य बनकर रो रहे
नित्य दिन एकल सा जीना जीने से उबास आये
नदी सा बेबाक चलना शौक कुछ ऐसे ही भाए

मोह का बंधन कठिन है जीने के तंतु तुम बने जो
प्राण में,धमनी में,मन में, लक्ष्य में तुम सने जो
संसार दरिया तैरना था अब तुम बने मझधार मेरे
असभ्य सा जीना था अब तुम बने श्रृंगार मेरे

हर नियामत तोड़ने थे अब तुम नियम सिखला रहे हो
वैराग्य के खोजी को तुम मादक रस चखा रहे हो
नशे की हालत में हूँ ये कौन से पथ पे चला हूँ
संसार सुख को छोड़ना था रंगीनियाँ मथने चला हूँ

निज नियम को तोड़ कर अंतर भाव विह्वल हो रहा हूँ
मन से लेकर ज्ञान में तुम्हारी ही हलचल हो रहा हूँ
स्वर्ग सा कुछ पा रहा हूँ अपने अंश तुममे खो रहा हूँ
अपने धरम को छोड़ कर तुम सा ही धार्मिक हो रहा हूँ.
तुमसे पुण्य सारे पा रहा हूँ पिछले पाप सारे धो रहा हूँ
ये कौन सा अंधड़ हो तुम तुम्हारे वेग में यूँ खो रहा हूँ

तुम जो अपलक  देखती हो आत्मा में दीप जलते
जड़ पड़े जर्जर पड़े अरमानों के सौभाग्य खुलते
अंक में जब घेरती हो धड़कने भी थम से  जाते
नख से लेकर शिख तक हर तंत्र है उत्सव मनाते

तुम ही मेरा स्वर्ग हो तुम ही मेरी धाम हो
तुम ही मेरा पुण्य हो तुम ही कर्म निष्काम हो
तुम ही राज्याभिषेक हो तुम ही विश्व विजय हो
तुम ही कुरुक्षेत्र हो तुम ही धनञ्जय हो
तुम ही मेरा जन्म हो तुम ही मेरा मरण हो
तुम हो मेरा अस्तित्व हो तुम ही अन्तःकरण हो

मोक्ष का लक्ष्य था वैराग्य था खोजने चला
तुम सा पवित्र प्रेम पा संसार में अब डूबने चला
कौन जाने इस पल से अगली साँस तुम बिन झेल पाऊँ
भगवन के चौसर और प्रपंच को क्या खेल पाऊँ
पल में सदियाँ जी रहा हूँ तुम सा जो अमृत मिल गया
निष्प्राण भटके पुष्प को सृजक सा माली मिल गया

हे प्रभु विनती है तुमसे जो अपनी संगिनी है चुन लिया
वरदान दो,आशीष  दो जो अपना भविष्य मैंने बुन लिया.
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Copyright @ Arun Bharti
               

एक कोने में संवरती तुम हो,एक कोने में निखरते हम हैं

एक कोने में संवरती तुम हो,एक कोने में निखरते हम हैं.
एक होने पे बिखरती तुम हो,एक होने पे बिखरते हम हैं.

जब तुम पास होती हो तो सनम साँस उफनती है.
जब तुम दूर होती तो सनम जान निकलती है.

जब जब हम बेहाल हुवे जब जब हम बेकल हुवे
तुम ही मेरा हलचल थी तुम ही मेरा पल पल थी.
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Copyright@ Arun Bharti

इम्तिहान लेती रहो

वो मुझे कसम देती हैं सच बोलने की

और खुद ही वक़्त पे बिखर जाती हैं.
ना भूलेंगे ये वादा देती हैं.
अगले ही पल मुकर जाती हैं.
सजदा करू मैं उनका ये आस रखती हैं.
बेवफा होकर भी मुझसे प्रेम का विश्वास रखती हैं.
नशे की हालत में समझ बैठी हैं.
कोई भी करवट मोड़ दे इतनी वो ऐठी हैं.
सनम तुम्हे बेवफा कहें,बेअकल कहें या कहें बदतमीज़.
इम्तिहान लेती रहो देंगे वफ़ा का,तुम हो ही अज़ीज़.

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