इस देश में कई देश रहते हैं !

इस देश में कई देश रहते हैं,
एक को उत्तर, एक को दक्षिण,
एक को पश्चिम, और
एक को उत्तर पूर्वी भारत कहते हैं!

सबसे अनोखा दक्षिण भारत लगता है,
प्रेम सद्भाव और आदर से रहता है,
जहाँ संस्कृति नंगापन से दूर है,
बड़े बड़े लोगों में भी,
जमीं से जुड़े रहने का दस्तूर है !

उत्तर पूर्वी देश के लोग,
मासूम और विदेशी लगते हैं,
फ़ैशिन में आगे, रस्मों में अलग
भोजन अनोखे, लोग खाते हैं धोखे !

उत्तर भारत के लोग,
काऊ बेल्ट कहलाते हैं,
देश की संसद में, वही छाते हैं।
उत्पात मचाते हैं, नेता कहाते हैं,
देश की जीडीपी को नीचे गिराते हैं!
धर्म और पाखंड से सबको लड़ाते हैं,
कुर्सी की खातिर कुछ भी कर जाते हैं ।

पश्चिम भारत के लोग,
व्यापार के धनी हैं,
दुनिया को धन्धा सिखाते हैं,
धंधा कैसा भी हो,
सब आज़माते हैं।
धनी होते हैं, धन के गीत गाते हैं!

सोचो ये सब अलग होते,
कैसा होता मंजर,
कौन होता आगे,
किसके हाथों में होता ख़ंजर?

: बिहारी चौपाल
: १६ मई २०२६ !

भटकना

रास्ता भटकना भी जरूरी है,
औकात का पता चलता है,
अपने और दूसरों के,
जज़्बात का पता चलता है।

मंज़िल पहले मिल जाती है,
अपने अंदर के डर और हिम्मत से,
और रूबरू हो जाते हैं,
अपने को थोड़ा और मजबूत पाते है।

जो सोचा नहीं था, वो हो जाता है,
इंसान अपने को बेहतर पाता है।

भटकने से कभी घबराना नहीं,
नए मोड़ लेने से कतराना नहीं,
भटकर भी मंजिल जल्दी पाओगे,
जीवन में नए नए मुकाम बनाओगे।

: बिहारी चौपाल

क्या कविता मुझसे अब छुट गयी है ?

क्या कविता मुझसे अब छुट गयी है ?

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बरबस बैठूं सोचूं अक्सर अब
क्या कविता मुझसे अब छुट गयी है ?
चिंतन करूँ गहन आकलन करूँ
क्या शब्द का सोता सुख गया है ?

यूँ उथल पुथल है निज जीवन में
करुणा दया और प्रेम भरे
सब भाव विचरते इस आँगन में
छल कपट से लेकर निश्छल स्नेह
सब रस का पान भी करता हूँ
बर्बर मानव के पशुता के
कर्मकांड सभी तो पढता हूँ.

चिड़ियों के कलरव, जल का कलकल
मादक सौन्दर्य, मासूम हलचल
बूढ़े हाथ,बेबस अबला, जर्जर ममता
ऐश्वर्य,मोटापा, जन्मजात अन्धता
रिश्तें की दरकन से संस्कारों के मरने तक
हर दृश्य का दर्शन करता हूँ,

लोभ मोह से हवस हबस तक
जर जोरू से भ्राता बध तक
सूरा से लेकर सुर लहरी तक
करुण क्रंदन से हर्ष नीर तक
धर्म भेद से मतभेद तक
जाति प्रथा से वेश्या प्रथा तक
हर एक नियम पढता हूँ.

फिर भी अँखियाँ हो ज़ार रो रही
सुर में कम्पन धमनी चलने में विवश हो रही
हे वीणावादिनी ! मुझसे मेरे शब्द ना छीनो
प्रेम वंदना करता हूँ और नेम तुम्हारे धरता हूँ
निष्कपट निरंतर चंचल शिष्यत्व समर्पण करता हूँ. 

 —– Arun Bharti 03 May 2012

एक कोने में संवरती तुम हो,एक कोने में निखरते हम हैं

एक कोने में संवरती तुम हो,एक कोने में निखरते हम हैं.
एक होने पे बिखरती तुम हो,एक होने पे बिखरते हम हैं.

जब तुम पास होती हो तो सनम साँस उफनती है.
जब तुम दूर होती तो सनम जान निकलती है.

जब जब हम बेहाल हुवे जब जब हम बेकल हुवे
तुम ही मेरा हलचल थी तुम ही मेरा पल पल थी.
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Copyright@ Arun Bharti

न मैं कविता गढ़ता

तुम मेरे पास होती तो ये खास होता.
गर तुम उदास होती तो मैं उदास होता.
न तुम तन्हा सहती,न मैं तन्हा रहता.
न तुम कविता पढ़ती,न मैं कविता गढ़ता.

------------- अरुण भारती 'चिंतित'

एक तरफ मतवाली तुम हो

एक तरफ मतवाली तुम हो

एक तरफ दारू की बोतल,एक तरफ मतवाली तुम हो.

एक तरफ है चखना चटपट, एक तरफ रसवाली तुम हो.
एक तरफ अंगूरी रस है, एक तरफ गुलाबी तुम हो.
एक तरफ तीखी सांसे हैं, एक तरफ कस्तूरी तुम हो.
एक तरफ बोतल की घनघन,एक तरफ पायल की छनछन.
एक तरफ पैग की झंझट, एक तरफ सागर बिन तट.
एक तरफ बदसूरत बोतल,एक तरफ सुडौल बदन तुम.
एक तरफ फूहड़ गाने हैं, एक तरफ मीठी कोयल तुम.
एक तरफ गन्दा मदिरालय, नख-शिख तक तुम शीशमहल हो.
एक तरफ मटमैली चादर, अंग अंग से तुम मखमल हो.
कौन भला मदिरालय जाये,पैसे की अब बली चढ़ाये.
अधरों से अब छू लेने दो,नैनों से अब पी लेने दो.
अंकपाश में बांध लो,पल में सदियाँ जी लेने दो.
इस नशे से चिंतित जी जीवन भर पार न पाएंगे.
जग से वैरागी होकर,तुम्हरे मदिरालय आयेंगे.
—– अरुण भारती ‘चिंतित’

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