ठाकुर और वाल्मीकि

ठाकुर और वाल्मिकी

इतने में ही परिभाषित होता है,
इस देश का सामाजिक ढाँचा।

मनीषा वाल्मीकि के पक्ष में,
उसके परिवार के साथ,
खड़े हैं वो लोग जो,
अपने को इंसान कहते हैं।
वो तमाम भीड़ जिसे
इस बात का दुःख है कि,
एक बेटी और इंसानियत को,
नोचा और लहूलुहान किया गया है।
साथ में कुछ मौकापरस्त भी खड़े हैं,
जिन्हें सेंकनी है अपनी,
राजनीति और कैरियर की रोटी।

वहीं दूसरी तरह,
एक बेशर्म भीड़ है,
मानसिकता है,
ऊंच, नीच और म्लेच्छ
मानने और जानने की।
जो साथ खड़ी है,
उन ठाकुरों के साथ,
12 गाँव की पंचायत,
खाप की जात पंचायत,
क्षत्रिय समाज, स्वर्ण समाज,
जो शोषण की प्रतीक है।

समझ में नहीं आता,
क्या यह काम क्षत्रिय जैसा है?
सवर्ण और दलित क्या है?
क्यों है? खून तो एक ही है,

यह सवाल यदि आपके मन में है,
तो आप इंसान हैं,
वरना ठाकुर और वाल्मीकि की कथा,
आपको सुहानी और रोमांचक लगेगी।
और आप इस उपलब्धि पर ताली बजाएंगे,
जो इंसानियत और भारतीयता को,
नश्तर की तरह भेद रही है,
सैकड़ो, हजारों सालों से।

जो इस धरा के इस छोर से,
उस अंतिम छोर तक,
अपने निशान छोड़ जाती है।
और इस ग्रह को, सवालों के बीच,
लहूलुहान छोड़ जाती है।
अंत भी नहीं दिखता मुझे,
ठाकुर और वाल्मीकि के भेद का,
सब कोरी और सुहानी बातें हैं।

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गिद्धों का ज़मीर

गिद्धों का ज़मीर
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हाथों में कैमरा लेकर,
जुबान पर जमीर लेकर,
समाज के खेवनहार,
उम्मीद का दीया जलाते थे।

आज तड़के, दिनदहाड़े,
सैकड़ो कैमरे के साथ,
एक लड़की को नोचते,
गिद्धों का झुंड देखा ।

गिद्ध, कभी विलुप्त नहीं होते,
वो, अपना आकार प्रकार बदलते हैं।
मैंने देखा है उन्हें,
कभी सफेद कुर्ता पायजामा,
कभी खाकी वर्दी और बन्दूक,
कभी हाथों में हथौड़ा और सामने कठघरा,
या स्टूडियो, सड़क पर कैमरे के साथ,

गिद्ध जिंदा रहते हैं।
बस लाशें बदलती हैं!

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