ये कुदरत का खेल कैसा है की तुम बिन रह नहीं पाते.
प्रेम अगन है दलदल है ये खुद को कह नहीं पाते.
तुम जब साथ रहती हो दिल फूलों की क्यारी लगता है.
जब तुम दूर रहती हो तो जीना भी भारी लगता है.
————-(अरुण भारती ‘चिंतित’)
मैं तीख़े सवाल करता हूँ!
ये कुदरत का खेल कैसा है की तुम बिन रह नहीं पाते.
प्रेम अगन है दलदल है ये खुद को कह नहीं पाते.
तुम जब साथ रहती हो दिल फूलों की क्यारी लगता है.
जब तुम दूर रहती हो तो जीना भी भारी लगता है.
————-(अरुण भारती ‘चिंतित’)
धरती के रिश्ते धरती और मुझ में एक बात खास है. हमारे ज़ीने के अंदाज़ पास पास हैं. तुम्हारे पास सूरज की धुप है और चंदा की शीतलता है. मेरे पास उसके होठों की गर्मी और छुवन की कोमलता है. तुम्हारे पास शहर हैं तो गाँव भी हैं. मेरे पास तुम हो तुम्हारी यादों के छावं भी है. धरती तुम्हारे पास हरियाली है तो सुखा भी है. मैंने उसके अंतस को और विरह को देखा भी है. तुम्हारे पास कलकल करती नदियाँ है,लोगों का अम्बार है. मेरे पास उसके नैन अश्रु है,उसका अन्छुवा सा प्यार है. तुम इतराती हो तुम्हारे पास कश्मीर है. मेरे पास वो पूरा है सशरीर है. तुमको गर्व है की संसद है महल है. मैं खुश हूँ मेरे पास ताजमहल है. तुम्हारे पास संघर्ष है तो प्रेम भी है. मैं उसका आस हूँ वो मेरा नेम भी है. धरती मुझे उससे भी प्यार है तुमसे भी प्यार है. हमारे सुख दुःख एक हैं,हम अच्छे यार हैं. -------------(अरुण भारती 'चिंतित')
तुम मीडिया वाले हो.
तुम मेरे पास होती तो ये खास होता. गर तुम उदास होती तो मैं उदास होता. न तुम तन्हा सहती,न मैं तन्हा रहता. न तुम कविता पढ़ती,न मैं कविता गढ़ता. ------------- अरुण भारती 'चिंतित'
मेरा मन निर्झर की भाती,अबाध गति से चलता है.
रामजी धक्का खाते रहते,रावण मंद मंद हँसता है.
हर तरफ रावण ही रावण,राम जी अल्पसंख्यक हैं.
राम जी हारे रावण जीते, ये संकट का सूचक है.
रावण का अट्टहास देख कर, चिंतित जी घबराते हैं.
इस विजय दिवस पर लो भैया, मन में भी आग लगाते हैं.
—————— अरुण भारती ‘चिंतित’