तुम मीडिया वाले हो.
सत्ता के जुमले पढ़ते हो.
भाषा इनकी अपनी गाथा गढ़ते हो.
इनकी गलियों में चरते हो.
इनकी काली करतूतों को,
श्वेत रंग करते हो.
वेश्यालय में बैठ कर,
कुंवारा दंभ भरते हो.
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(अरुण भारती ‘चिंतित’)
मैं तीख़े सवाल करता हूँ!
तुम मीडिया वाले हो.
तुम मेरे पास होती तो ये खास होता. गर तुम उदास होती तो मैं उदास होता. न तुम तन्हा सहती,न मैं तन्हा रहता. न तुम कविता पढ़ती,न मैं कविता गढ़ता. ------------- अरुण भारती 'चिंतित'
मेरा मन निर्झर की भाती,अबाध गति से चलता है.
रामजी धक्का खाते रहते,रावण मंद मंद हँसता है.
हर तरफ रावण ही रावण,राम जी अल्पसंख्यक हैं.
राम जी हारे रावण जीते, ये संकट का सूचक है.
रावण का अट्टहास देख कर, चिंतित जी घबराते हैं.
इस विजय दिवस पर लो भैया, मन में भी आग लगाते हैं.
—————— अरुण भारती ‘चिंतित’
एक तरफ दारू की बोतल,एक तरफ मतवाली तुम हो.
अच्छी लगती हो