तस्मै श्री गुरुवे नमः

जब मेरा नवोदय में जाना तय हो गया था, मुझे याद है एक महीने से मेरी माँ रो रही थी.मैं अक्सर रात में पढ़ते पढ़ते सो जाया करता था। फिर वो पानी डालकर या गुदगुदी कर मुझे जगाती थी खाना खिलाने. उसे यही चिंता थी की मुझे कौन जगायेगा खाना खाने के लिए. लेकिन मुझे गावं और गरीबी से निकलने का अवसर मिला था.मैंने इतनी छोटी उम्र में भी “पेटी ” भर लिया था. 6अक्टूबर 1995 को जब आया तो बड़ा अच्छा लगा. पापा को अलविदा कह स्कूल हॉस्टल चला गया.शाम को थावें वालों का पूरा परिवार साथ देने आया था. मेरा अपना परिवार, स्कूल हो गया था. सुन्दर राजकिरण को रोते हुवे देखा तो उसे मनाने और समझाने लगा. रश्मि मैडम सब रोते बच्चों को मना रही थीं. सर लोग भी मना रहे थे। इस तरह सब बच्चों को नया घर-परिवार-मम्मी -पापा मिल गए। यही संसार सुख दुःख और बेहतर बनाने का साथी रहा 2000 तक. आजतक है. जबतक ज़िंदा हैं रहेगा।

मुझे याद है S N झा सर का सबको डांटना फटकारना दुलारना।गीता मैडम, रूपम मैडम,मुकेश सर, का ये चिंता करना की इस निर्दयी दुनिया में ये भोला बालक कैसे गुजर बसर करेगा ? ! मुझे याद है गीता मैडम और रूपम मैडम को मुझे घसीटते हुवे मेस ड्यूटी पर ले जाना। मुझे वो फल, वो मिठाईयां, वो प्यार और मेरे लिए चिंता याद है. मेरे कांपते हाथों, धड़कते दिल को ढांढस बढ़ाना और सम्भालना याद है. रोना – रुलाना भी याद है. मेरे घर से दूर का वो दूसरा घर संसार याद है जिसने मेरे बाजुओं में इतनी ताक़त, दिल में इतना हौसला, मन में इतने अरमान, ज़िन्दगी में इतने उड़ान दिए।

लिखता चलूँ तो आंसुओं का समंदर लिख दूँ, प्रेरणा का पर्वत लिख दूँ, प्यार-वात्सल्य का पुराण लिख दूँ।

गीता मैडम, मुकेश सर, विनय सर, गोपाल सर, बायो सर, आर्ट सर, प्रिंसपल सर, रश्मि मैडम, रूपम मैडम, मेरे प्राथमिक विद्यालय के कमला सर, हाई स्कूल के आलम सर, IIT के समस्त गुरुजन, और बचपन में ऊँगली पकड़ कर चलना सिखाने वाले, लिखना सिखाने वाले, बोलना सिखाने वाले मेरे माता – पिता, आप सबका प्यार, आशीर्वाद है की आज मैं जहाँ भी हूँ और ऊँचा उठने की तमन्ना रखता हुँ. आभार और शाष्टांग नमन !

ॐ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु :,गुरुरेव महेश्वरः |
गुरुरेव परब्रह्म, तस्मै श्री गुरुवे नमः ||

अखण्डमण्डलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम ।
तत्पदं दर्शितं येन, तस्मै श्री गुरुवे नमः ॥

मातृवत लालयित्री च, पितृवत् मार्गदर्शिका ।
नमोअस्तु गुरुसत्तायै, श्रद्धा – प्रज्ञायुता च या ॥

ॐ श्री गुरुवे नमः

अब कुकृत्य कौन सा बाकी है

I dedicate this poem to the people of the world who feel for the humankind,and to the blessings of Geeta Madam & Vinay Sir,and to the love of the people who consider that I could write, AND to the inspiration of terrific poetry of Ramdhari Singh Dinkar ji & Harivansh Rai Bachchan ji. I am Happy !

अब कुकृत्य कौन सा बाकी है
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जो जाति का दंभ लिए ले जांघ ठोक चलते हैं
वो कर्म से ऊपर जन्म का दान लिए चलते हैं

जो इस धरती पर धर्म का भार लिए चलते हैं
वो मनुज पापी के मोक्ष का पतवार लिए चलते हैं.

है कलियुग यह, कल छल से सबपे वार किया जाता है.
खून सींच,धर शीश-माल वसुधा का श्रृंगार किया जाता है.
यहाँ विजय पात फहराने को,हर युक्त जुटाते लोग सभी
कर बंधू -बांधव का शीश हरण,होते हैं मोद प्रमोद सभी.
कर नर वध,औ कर पशु वध ऊँचे नाम हमारे होते हैं.
हो लोक-लुलुप हर पाप करें,पुनीत ये काम हमारे होते हैं.
क्या हार जीत,क्या स्वर्ग नरक,किसको मिलता है पुण्य-धाम
क्यूँ सोचें इतना नर नश्वर,क्यों करना कोई धर्म-नाम.

क्या सचमुच हम कुछ सभ्य हुवे, जब मनुजत्व शर्माता है
पशु झुण्ड देख ये बर्बरता, उर-मन ही बहुत अकुलाता है.
सहस्त्रों सहस्त्र वर्षो पहले जब हम आखेट किया करते थे
ले नग्न देह,हर पशु प्राण अपना उदर भरा करते थे
पत्थर से आग जलाते थे,पत्थर ही शत्रु पर ढाते थे
तबसे लेकर इस काल तक,हमने गहन शोध-संधान किया
सब चल-अचल संसाधन ने वर्चस्व हमारा मान लिया.
है क्लांत मन,है भीत आत्म,रे मनुज क्या अद्भुत काम किया.
ना पशु रहा,ना मनुज रहा,रे बर्बर होकर क्या बेजोड़ नाम किया.

अम्बर भी तेरा त्रास सहे,वसुधा सिसके उर-नीर बहे
त्रिलोकी सृष्टि रचेता भी,प्रलाप में अकथ हर वचन कहें
अब कुकृत्य कौन सा बाकी है,दर दर पे पाप का अनल जले
क्यूँ दिनकर अब अस्त न होते हैं,क्यूँ शीतल होकर चाँद जले.
क्यूँ मंद पवन मोदक होते,क्यूँ मौसमी सभी बयार चले.
अब कौन कुकर्म रह बाकी है,क्यूँ श्रष्टि का अंत नहीं होता.
क्यूँ सागर होकर उन्मत समग्र धरती को नही भींगा देता.

है मन मलिन,उर कांप रहा,चंहु और बर्बरता नाच रही !
क्या जीवन है,या शाप कोई,या काल सभी को बांच रही.
न शब्द का सोता सूखता है,हर एक पोर सब दुखता है.
हे नाथ,मुझे हर लो वसुधा का क्रन्दन ना अब देखा जाता.
अनगिन ग्रन्थ लिखूं,ना तब भी मनुज पाप लेखा जाता.
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Copyright@ Arun Bharti

इन रिश्तों का सामान !

इन रिश्तों का सामान !
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तुम जो रिश्ते को
परचून की दुकान समझते हो
पान का थूकदान समझते हो
रेलवे का प्लेटफार्म समझते हो
क्या गज़ब करते हो.

तुम जो रिश्ते को
बिना भाड़े का मकान समझते हो
तुम्हारे इंतज़ार में बस हम जगे
ऐसा जागरूक मेजबान समझते हो
क्या गज़ब करते हो.

मूलरूप से तुम व्यापारी
हर रिश्ते का मोल लगाते हो
लेन देन के खेल में बस
लेन लेन ही खाते हो

मैं बेचारा सीधा साधा
सच्चा सा मेजबान
चलो उठाओ ठगने वाला
इन रिश्तों का सामान !
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Copyright@ Arun Bharti

 

माना की सब झूठ का शहर है

माना की सब झूठ का शहर है
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जिनको सहूलियत है सोहबत है
पैसों की ताक़त की रुतबे की
उनके लफ्ज़ बड़े सलीक और
झूठ में तराशे से होते हैं.

जो फ़कीर है उसके पास
जलालत है ज़मीर है फक्र है
तीखी जुबां और कडवे बोल
लेकर झूठ के बियावान में
अकेले दरदर में भटकते हैं.

जो ऊँचे ओहदे पे होकर तुम
सच को तोड़ने मरोड़ने जोड़ने
का हर विकल्प पाते हो.
परदे के पीछे सच का थप्पड़ खाकर
सामने झूठ पहन इतराते हो.

आत्मा मरती नहीं अमर है
माना की सब झूठ का शहर है
पर ये जहर पीकर दर्द से
बिलबिलाओगे तुम
कभी ना कभी सच से हारकर
कुछ तो अंतरात्मा की
सुन पाओगे तुम,

तभी रामराज्य होगा
तभी तेज़ का साम्राज्य होगा !
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Copyright@ Arun Bharti

ये पीड़ा का कीड़ा सबको नित दिन काटे है

ये पीड़ा का कीड़ा सबको नित दिन काटे है
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कोई आरक्षण से पीड़ित है कोई जातिवाद से
कोई स्वर्ण होकर पीड़ित है कोई दलितवाद से
कोई भविष्य से पीड़ित है कोई इतिहास से
कोई समता से पीड़ित है कोई तिरस्कार से

कोई हिंदुत्व से पीड़ित है कोई कठमुल्ला से
कोई ॐ से पीड़ित है कोई अल्ला से
कोई त्रिशूल से पीड़ित है कोई अजान से
कोई हिन्दू से पीड़ित है कोई मुसलमान से

जनता नेता से पीड़ित है नेता जनता से
संसद चुनाव से पीड़ित है चुनाव संसद से
कोई घोटाले से पीड़ित है कोई पर्दाफाश से
कोई घुस से पीड़ित है कोई अथक प्रयास से
कोई मोटापे से पीड़ित है कोई रोटी की तलाश से

निजी क्षेत्र सरकारी से पीड़ित है सरकारी निजी क्षेत्र से
कोई फ़ौरन निकाला जाये कोई बैठ कुर्सी तोड़े
कोई धारदार इंग्लिश बोले कोई गड़बड़ घोटाला जोड़े
कोई बाज़ार से पीड़ित है कोई संस्कार से
कोई आधुनिकता से पीड़ित है कोई आडम्बर से

शहर गाँव से पीड़ित है गाँव शहर से
दिन रात से पीड़ित है रात दिन से
धुप छावं से पीड़ित है छावं धुप से
कोई बदशक्ल होकर पीड़ित है कोई रूप से

कोई बलात्कार से पीड़ित है कोई व्यभिचार से
कोई व्यापार से पीड़ित है कोई पवित्र प्यार से
कोई आतंक से पीड़ित है कोई दमन से
कोई छुटकारे से पीड़ित है कोई हनन से

भगवन इन्सान से पीड़ित है इन्सान भगवन से
कोई अहंकार से पीड़ित है कोई आत्म सम्मान से
आग पानी के नमी से पीड़ित है पानी आग के ताप से
कोई बाप बेटे से पीड़ित है कोई बेटा अपने बाप से

दिल दिमाग से पीड़ित है दिमाग दिल से
प्रेमिका हवस से पीड़ित है प्रेमी बिल से
कोई हिंदुस्तान से पीड़ित है कोई पाकिस्तान से
कोई सुनामी से पीड़ित है कोई रेगिस्तान से

ये पीड़ा का कीड़ा सबको नित दिन काटे है
प्रेम से लेकर घृणा तक सबने सबको बाटें है
अज़ब खेल है दुनिया का बरबस चलता जाये
हंसी से लेकर रुदन तक सबको सबकुछ भाए
कौन है ख़ूनी कौन निर्दोष कैसे इसका न्याय करें
सभी पीड़ित हैं भेद करने में क्यूँ वक़्त बर्बाद करें.
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Copyright@ Arun Bharti

ये कौन सा अंधड़ हो तुम तुम्हारे वेग में यूँ खो रहा हूँ

ये कौन सा अंधड़ हो तुम तुम्हारे वेग में यूँ खो रहा हूँ
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संग चलने से बड़ा संगीन कुछ होता नहीं
एक मत होने से और रंगीन कुछ होता नहीं.
जो चलूँ संग हाथ थामे सहस्त्र नजरे सवाल पूछें
जो नजर भर देख लें समाज में बवाल गूंजे

भ्रम का बंधन बेड़ियों में लोग कुंठित हो रहे
रिश्तों के चिथड़ों समेटे सभ्य बनकर रो रहे
नित्य दिन एकल सा जीना जीने से उबास आये
नदी सा बेबाक चलना शौक कुछ ऐसे ही भाए

मोह का बंधन कठिन है जीने के तंतु तुम बने जो
प्राण में,धमनी में,मन में, लक्ष्य में तुम सने जो
संसार दरिया तैरना था अब तुम बने मझधार मेरे
असभ्य सा जीना था अब तुम बने श्रृंगार मेरे

हर नियामत तोड़ने थे अब तुम नियम सिखला रहे हो
वैराग्य के खोजी को तुम मादक रस चखा रहे हो
नशे की हालत में हूँ ये कौन से पथ पे चला हूँ
संसार सुख को छोड़ना था रंगीनियाँ मथने चला हूँ

निज नियम को तोड़ कर अंतर भाव विह्वल हो रहा हूँ
मन से लेकर ज्ञान में तुम्हारी ही हलचल हो रहा हूँ
स्वर्ग सा कुछ पा रहा हूँ अपने अंश तुममे खो रहा हूँ
अपने धरम को छोड़ कर तुम सा ही धार्मिक हो रहा हूँ.
तुमसे पुण्य सारे पा रहा हूँ पिछले पाप सारे धो रहा हूँ
ये कौन सा अंधड़ हो तुम तुम्हारे वेग में यूँ खो रहा हूँ

तुम जो अपलक  देखती हो आत्मा में दीप जलते
जड़ पड़े जर्जर पड़े अरमानों के सौभाग्य खुलते
अंक में जब घेरती हो धड़कने भी थम से  जाते
नख से लेकर शिख तक हर तंत्र है उत्सव मनाते

तुम ही मेरा स्वर्ग हो तुम ही मेरी धाम हो
तुम ही मेरा पुण्य हो तुम ही कर्म निष्काम हो
तुम ही राज्याभिषेक हो तुम ही विश्व विजय हो
तुम ही कुरुक्षेत्र हो तुम ही धनञ्जय हो
तुम ही मेरा जन्म हो तुम ही मेरा मरण हो
तुम हो मेरा अस्तित्व हो तुम ही अन्तःकरण हो

मोक्ष का लक्ष्य था वैराग्य था खोजने चला
तुम सा पवित्र प्रेम पा संसार में अब डूबने चला
कौन जाने इस पल से अगली साँस तुम बिन झेल पाऊँ
भगवन के चौसर और प्रपंच को क्या खेल पाऊँ
पल में सदियाँ जी रहा हूँ तुम सा जो अमृत मिल गया
निष्प्राण भटके पुष्प को सृजक सा माली मिल गया

हे प्रभु विनती है तुमसे जो अपनी संगिनी है चुन लिया
वरदान दो,आशीष  दो जो अपना भविष्य मैंने बुन लिया.
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Copyright @ Arun Bharti
               

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