प्रदीप की कवितायेँ

इंसाफ की डगर

इन्साफ़ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के
ये देश है तुम्हारा, नेता तुम्हीं हो कल के

दुनिया के रंज सहना और कुछ न मुँह से कहना
सच्चाइयों के बल पे आगे को बढ़ते रहना
रख दोगे एक दिन तुम संसार को बदल के
इन्साफ़ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के
ये देश है तुम्हारा, नेता तुम्हीं हो कल के

अपने हों या पराए सबके लिये हो न्याय
देखो कदम तुम्हारा हरगिज़ न डगमगाए
रस्ते बड़े कठिन हैं चलना सम्भल-सम्भल के
इन्साफ़ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के
ये देश है तुम्हारा, नेता तुम्हीं हो कल के

इन्सानियत के सर पर इज़्ज़त का ताज रखना
तन मन भी भेंट देकर भारत की लाज रखना
जीवन नया मिलेगा अंतिम चिता में जल के,
इन्साफ़ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के
ये देश है तुम्हारा, नेता तुम्हीं हो कल के

रामधारी सिंह “दिनकर” की कवितायेँ

लोहे के पेड़ हरे होंगे

लोहे के पेड़ हरे होंगे,
तू गान प्रेम का गाता चल,
नम होगी यह मिट्टी ज़रूर,
आँसू के कण बरसाता चल।

सिसकियों और चीत्कारों से,
जितना भी हो आकाश भरा,
कंकालों क हो ढेर,
खप्परों से चाहे हो पटी धरा ।

आशा के स्वर का भार,
पवन को लेकिन, लेना ही होगा,
जीवित सपनों के लिए मार्ग
मुर्दों को देना ही होगा।

रंगो के सातों घट उँड़ेल,
यह अँधियारी रँग जायेगी,
ऊषा को सत्य बनाने को
जावक नभ पर छितराता चल।

आदर्शों से आदर्श भिड़े,
प्रज्ञा प्रज्ञा पर टूट रही।
प्रतिमा प्रतिमा से लड़ती है,
धरती की किस्मत फूट रही।

आवर्तों का है विषम जाल,
निरुपाय बुद्धि चकराती है,
विज्ञान-यान पर चढी हुई
सभ्यता डूबने जाती है।

जब-जब मस्तिष्क जयी होता,
संसार ज्ञान से चलता है,
शीतलता की है राह हृदय,
तू यह संवाद सुनाता चल।

सूरज है जग का बुझा-बुझा,
चन्द्रमा मलिन-सा लगता है,
सब की कोशिश बेकार हुई,
आलोक न इनका जगता है,

इन मलिन ग्रहों के प्राणों में
कोई नवीन आभा भर दे,
जादूगर! अपने दर्पण पर
घिसकर इनको ताजा कर दे।

दीपक के जलते प्राण,
दिवाली तभी सुहावन होती है,
रोशनी जगत् को देने को
अपनी अस्थियाँ जलाता चल।

क्या उन्हें देख विस्मित होना,
जो हैं अलमस्त बहारों में,
फूलों को जो हैं गूँथ रहे
सोने-चाँदी के तारों में।

मानवता का तू विप्र!
गन्ध-छाया का आदि पुजारी है,
वेदना-पुत्र! तू तो केवल
जलने भर का अधिकारी है।

ले बड़ी खुशी से उठा,
सरोवर में जो हँसता चाँद मिले,
दर्पण में रचकर फूल,
मगर उस का भी मोल चुकाता चल।

काया की कितनी धूम-धाम!

दो रोज चमक बुझ जाती है;
छाया पीती पीयुष,
मृत्यु के उपर ध्वजा उड़ाती है ।

लेने दे जग को उसे,
ताल पर जो कलहंस मचलता है,
तेरा मराल जल के दर्पण
में नीचे-नीचे चलता है।

कनकाभ धूल झर जाएगी,
वे रंग कभी उड़ जाएँगे,
सौरभ है केवल सार, उसे
तू सब के लिए जुगाता चल।

क्या अपनी उन से होड़,
अमरता की जिनको पहचान नहीं,
छाया से परिचय नहीं,
गन्ध के जग का जिन को ज्ञान नहीं?

जो चतुर चाँद का रस निचोड़
प्यालों में ढाला करते हैं,
भट्ठियाँ चढाकर फूलों से
जो इत्र निकाला करते हैं।

ये भी जाएँगे कभी, मगर,
आधी मनुष्यतावालों पर,
जैसे मुसकाता आया है,
वैसे अब भी मुसकाता चल।

सभ्यता-अंग पर क्षत कराल,
यह अर्थ-मानवों का बल है,
हम रोकर भरते उसे,
हमारी आँखों में गंगाजल है।

शूली पर चढ़ा मसीहा को

वे फूल नहीं समाते हैं
हम शव को जीवित करने को
छायापुर में ले जाते हैं।

भींगी चाँदनियों में जीता,
जो कठिन धूप में मरता है,
उजियाली से पीड़ित नर के
मन में गोधूलि बसाता चल।

यह देख नयी लीला उनकी,
फिर उनने बड़ा कमाल किया,
गाँधी के लोहू से सारे,
भारत-सागर को लाल किया।

जो उठे राम, जो उठे कृष्ण,
भारत की मिट्टी रोती है,
क्या हुआ कि प्यारे गाँधी की
यह लाश न जिन्दा होती है?

तलवार मारती जिन्हें,
बाँसुरी उन्हें नया जीवन देती,
जीवनी-शक्ति के अभिमानी!
यह भी कमाल दिखलाता चल।

धरती के भाग हरे होंगे,
भारती अमृत बरसाएगी,
दिन की कराल दाहकता पर
चाँदनी सुशीतल छाएगी।

ज्वालामुखियों के कण्ठों में
कलकण्ठी का आसन होगा,
जलदों से लदा गगन होगा,
फूलों से भरा भुवन होगा।

बेजान, यन्त्र-विरचित गूँगी,

मूर्त्तियाँ एक दिन बोलेंगी,
मुँह खोल-खोल सब के भीतर
शिल्पी! तू जीभ बिठाता चल।

लोहे के पेड़ हरे होंगे,
तू गान प्रेम का गाता चल.

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वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नही है
थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नही है

चिन्गारी बन गयी लहू की बून्द गिरी जो पग से
चमक रहे पीछे मुड देखो चरण-चिनह जगमग से
बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नही है
थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नही है

अपनी हड्डी की मशाल से हृदय चीरते तम का,
सारी रात चले तुम दुख झेलते कुलिश का।
एक खेय है शेष, किसी विध पार उसे कर जाओ;
वह देखो, उस पार चमकता है मन्दिर प्रियतम का।
आकर इतना पास फिरे, वह सच्चा शूर नहीं है;
थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।

दिशा दीप्त हो उठी प्राप्त कर पुण्य-प्रकाश तुम्हारा,
लिखा जा चुका अनल-अक्षरों में इतिहास तुम्हारा।
जिस मिट्टी ने लहू पिया, वह फूल खिलाएगी ही,
अम्बर पर घन बन छाएगा ही उच्छ्वास तुम्हारा।
और अधिक ले जाँच, देवता इतन क्रूर नहीं है।
थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।

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रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव है ।
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है ।

जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?
मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते ।
और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी
चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।

आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का
आज उठता और कल फिर फूट जाता है ।
किन्तु, फिर भी धन्य ठहरा आदमी ही तो
बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है ।

मैं न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली,
देख फिर से चाँद! मुझको जानता है तू?
स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी,
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?

मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,
आग में उसको गला लोहा बनाता हूँ ।
और उस पर नींव रखता हूँ नये घर की,
इस तरह दीवार फौलादी उठाता हूँ ।

मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी
कल्पना की जीभ में भी धार होती है ।
वाण ही होते विचारों के नहीं केवल,
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।

स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे
रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे ।
रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे

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किसको नमन करूँ मैं भारत

तुझको या तेरे नदीश, गिरि, वन को नमन करूँ, मैं ?
मेरे प्यारे देश ! देह या मन को नमन करूँ मैं ?
किसको नमन करूँ मैं भारत ? किसको नमन करूँ मैं ?

भू के मानचित्र पर अंकित त्रिभुज, यही क्या तू है ?
नर के नभश्चरण की दृढ़ कल्पना नहीं क्या तू है ?
भेदों का ज्ञाता, निगूढ़ताओं का चिर ज्ञानी है
मेरे प्यारे देश ! नहीं तू पत्थर है, पानी है
जड़ताओं में छिपे किसी चेतन को नमन करूँ मैं ?

भारत नहीं स्थान का वाचक, गुण विशेष नर का है
एक देश का नहीं, शील यह भूमंडल भर का है
जहाँ कहीं एकता अखंडित, जहाँ प्रेम का स्वर है
देश-देश में वहाँ खड़ा भारत जीवित भास्कर है
निखिल विश्व को जन्मभूमि-वंदन को नमन करूँ मैं !

खंडित है यह मही शैल से, सरिता से सागर से
पर, जब भी दो हाथ निकल मिलते आ द्वीपांतर से
तब खाई को पाट शून्य में महामोद मचता है
दो द्वीपों के बीच सेतु यह भारत ही रचता है
मंगलमय यह महासेतु-बंधन को नमन करूँ मैं !

दो हृदय के तार जहाँ भी जो जन जोड़ रहे हैं
मित्र-भाव की ओर विश्व की गति को मोड़ रहे हैं
घोल रहे हैं जो जीवन-सरिता में प्रेम-रसायन
खोर रहे हैं देश-देश के बीच मुँदे वातायन
आत्मबंधु कहकर ऐसे जन-जन को नमन करूँ मैं !

उठे जहाँ भी घोष शांति का, भारत, स्वर तेरा है
धर्म-दीप हो जिसके भी कर में वह नर तेरा है
तेरा है वह वीर, सत्य पर जो अड़ने आता है
किसी न्याय के लिए प्राण अर्पित करने जाता है
मानवता के इस ललाट-वंदन को नमन करूँ मैं !

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गीत, अगीत, कौन सुंदर है?

गाकर गीत विरह की तटिनी
वेगवती बहती जाती है,
दिल हलका कर लेने को
उपलों से कुछ कहती जाती है।
तट पर एक गुलाब सोचता,
“देते स्*वर यदि मुझे विधाता,
अपने पतझर के सपनों का
मैं भी जग को गीत सुनाता।”

गा-गाकर बह रही निर्झरी,
पाटल मूक खड़ा तट पर है।
गीत, अगीत, कौन सुंदर है?

बैठा शुक उस घनी डाल पर
जो खोंते पर छाया देती।
पंख फुला नीचे खोंते में
शुकी बैठ अंडे है सेती।
गाता शुक जब किरण वसंती
छूती अंग पर्ण से छनकर।
किंतु, शुकी के गीत उमड़कर
रह जाते स्*नेह में सनकर।

गूँज रहा शुक का स्*वर वन में,
फूला मग्*न शुकी का पर है।
गीत, अगीत, कौन सुंदर है?

दो प्रेमी हैं यहाँ, एक जब
बड़े साँझ आल्*हा गाता है,
पहला स्*वर उसकी राधा को
घर से यहाँ खींच लाता है।
चोरी-चोरी खड़ी नीम की
छाया में छिपकर सुनती है,
‘हुई न क्*यों मैं कड़ी गीत की
बिधना’, यों मन में गुनती है।

वह गाता, पर किसी वेग से
फूल रहा इसका अंतर है।
गीत, अगीत, कौन सुन्*दर है?

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विवशता

कल तुम फिर मेरे सपनो में आई थी,

मेरी आँखों में विवशता,तुम्हारी आँखों में रुलाई थी.
काश,समाज के विष को पी लिए होते,
अपने सपनो को उस पल को जी लिए होते.
ना अपने घर आज तुम उदास होती,
ना मैं उदास होता.
सूरज के जलने से पहले और बुझने के बाद तक,
हम तुम संग तल्लीन होते,
मुझे श्रृष्टि पर ऐतवार होता.
—अरुण भारती ‘चिंतित’

रिश्तों में फासला

रिश्तों में फासला
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कभी कहीं जाने अनजाने में,
छोटी छोटी बातों पर,
हम इतने दूर हो जाते हैं की,
फिर पास आना मुश्किल हो जाता है.

वो सोचते हैं हम कदम बढ़ाये,
हम सोचते हैं वो कदम बढ़ाये,
इसी होड़ में रिश्तों में,
फासला बढ़ता जाता है.

जहाँ ये तय था की शरीक होंगे,
हर पलों के गुजरने में,
बहुत सा हसीं लम्हा अन्छुवा रह जाता है.

ऐसे गुरुर से क्या फायदा,
ऐसी गुस्ताखी से क्या गिला,
जब अगले पल हमारा या तुम्हारा वजूद,
साबित और सुरक्षित रहेगा,
इसका कोई निश्चित नहीं पता.

By: Holy~Devil

कैसे मिटावोगी इतने साक्ष्य तुम

मेरे यादों के पुख्ता दस्तावेजों को,
बड़ी ही सतर्कता और सफाई से ,
समूचा ही जला देना.

एक कतरा भी मिला उस साक्ष्य का,
जिसमें लिखे हैं हमारे अनमोल अन्तरंग लम्हें,
पेश कर दूंगा भरी महफ़िल में,
और तुम्हारे रेशमी से गाल पे दरार आएगी गुलाबी ,
चेहरे की रंगत यूँ उड़ेगी,
जैसे पखेरू प्राण.

समय की  छाती पर जो निशानी छोड़ते हम ,
जब ओ बनकर साक्ष्य आती,
सरहदों में दरारे पड़ जाती है ,
इंसानियत हैरान होती है ,
तुम्हारा कृत्रिम चेहरे का रंग रोगन,
क्या फिर साक्ष्य को झेल पायेगा ??

फिर भी तुम कोशिश करना उनको मिटाने की,
चाँद ने पखवाड़े बदले हमने देखे साथ साथ ,
तारो की श्रृंखलाएं अपना गणित बदल कर कई आकार ली,
हमने देखे साथ साथ ,
मेरे रोम रोम कितने अरमान से अंगडाई लिए ,
ओ तुम्हारी भीनी सी छुवन का असर था.

कैसे मिटावोगी इतने  साक्ष्य तुम,
कैसे बचोगी अपनी लालिमा के बिखरने पे,
फिर भी कोशिश करना सतर्कता से.
(Holy~Devil) 4th MAY 2010

तुम्हारी बहुत याद आती है

दीपक के लौ की तरह,
झिलमिलाती , टिमटिमाती
अंधेरी घनेरी रातों में
तुम्हारी बहुत याद आती है ।

ये कायनात सारी घुप्प अंधेरे में
चुप-सी रहती है,
केवल बैताल-सी साँय-2 कर हवा  चलती है  ,
कभी-कभी—–

मखमली-सी सेज पर ठंडी-बासी  सी,
मुर्दानगी छायी रहती है ।
इस तन्हाई में करवट बदलते-2
मेरी कमर मुझसे रुठ-सी गयी है ।

पहले कितना अच्छा लगता था
जब यही मेरी प्यारी कमर
नितांत एकांत में, तुम्हारी कमर से
अठखेलियाँ किया करती थी ।
हमारे- तुम्हारे उन्मुक्त तरंगों को
महकती सासों को एक करती थी ।

वही कमर अब बेगानी हो गयी है,
उसने थिरकना भी छोड. दिया है ,
अब मचलती भी नही,
खामोशी-से खिझकर
मेरी तन्हाई पर वह भी
मुँह फेर लेती है,
और मुझ पर हँसती है ।

कभी-2 मुझे लगता है
मेरी कमर ही मेरी फतह पर जश्न मनाएगी

सुबह को उठता हूँ तो
तुम्हारा रात में न होना
आर-पार तक चीर जाता है ।


यूं तो बालकनी कि खिडकी से झाकनें पर,
बाहर बहुत ही रेलम-पेल नजर आता है,
लोग भागते से नजर आते हैं ।
पर, तुम्हारे न होने से ,चारों तरफ,दर्द भरी तन्हाई का,
कुहासा दिन रात नजर आता है ।

सुबह से शाम यूं ही मायूसी में
बरसाती पानी की तरह उदास बित जाता है ।
फिर वही रात की नीरस खामोशी
काट खाने दौडती है–

सोचता हूँ इस तन्हाई में कुछ नज्म गाऊँ
पर, दिल रो-2 कर दर्द भरे नगमें
गुनगुनाने लगता है ।

कभी-2 सपने में बडबडाने लगता हूँ-
देखता हूँ,तुम्हे खिंच कर ले जा रहा है कोई
मुझसे दूर, बहुत दूर–
मैं हडबडाकर उठ बैठता हूँ,
तो फिर वही ठँडा बिस्तर
वही भयानक खामोशी ।

पहले तुम जब मिलती थी तो,
मेरी आँखें खुशी से बरस उठती थी
अब तो उनसे खुन टपकता है ।
मेरे अंतर में जो घाव है
वह जब बजबजाकर रिसने लगता है
तो,मेरा दिल चित्कार उठता है

मुझे मेरे दिल का रोना, कराहना
और धडकन का काँपना-थऱथऱाना
साफ सुनाई देता है ।
अब तक तो तुम्हारे इंतजार की परीक्षा में,
मैं पास होता रहा–
गर अब परीक्षा लोगी,
तो हार जाऊँगा …

मुझे इन तन्हाईयों  से कोई सारोकार  नहीं
अब तुम आ जाओ……
क्योंकि,तुम्हारी बहुत याद आती है !

Regards,
Holy~Devil

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