तुम्हारी बहुत याद आती है

दीपक के लौ की तरह,
झिलमिलाती , टिमटिमाती
अंधेरी घनेरी रातों में
तुम्हारी बहुत याद आती है ।

ये कायनात सारी घुप्प अंधेरे में
चुप-सी रहती है,
केवल बैताल-सी साँय-2 कर हवा  चलती है  ,
कभी-कभी—–

मखमली-सी सेज पर ठंडी-बासी  सी,
मुर्दानगी छायी रहती है ।
इस तन्हाई में करवट बदलते-2
मेरी कमर मुझसे रुठ-सी गयी है ।

पहले कितना अच्छा लगता था
जब यही मेरी प्यारी कमर
नितांत एकांत में, तुम्हारी कमर से
अठखेलियाँ किया करती थी ।
हमारे- तुम्हारे उन्मुक्त तरंगों को
महकती सासों को एक करती थी ।

वही कमर अब बेगानी हो गयी है,
उसने थिरकना भी छोड. दिया है ,
अब मचलती भी नही,
खामोशी-से खिझकर
मेरी तन्हाई पर वह भी
मुँह फेर लेती है,
और मुझ पर हँसती है ।

कभी-2 मुझे लगता है
मेरी कमर ही मेरी फतह पर जश्न मनाएगी

सुबह को उठता हूँ तो
तुम्हारा रात में न होना
आर-पार तक चीर जाता है ।


यूं तो बालकनी कि खिडकी से झाकनें पर,
बाहर बहुत ही रेलम-पेल नजर आता है,
लोग भागते से नजर आते हैं ।
पर, तुम्हारे न होने से ,चारों तरफ,दर्द भरी तन्हाई का,
कुहासा दिन रात नजर आता है ।

सुबह से शाम यूं ही मायूसी में
बरसाती पानी की तरह उदास बित जाता है ।
फिर वही रात की नीरस खामोशी
काट खाने दौडती है–

सोचता हूँ इस तन्हाई में कुछ नज्म गाऊँ
पर, दिल रो-2 कर दर्द भरे नगमें
गुनगुनाने लगता है ।

कभी-2 सपने में बडबडाने लगता हूँ-
देखता हूँ,तुम्हे खिंच कर ले जा रहा है कोई
मुझसे दूर, बहुत दूर–
मैं हडबडाकर उठ बैठता हूँ,
तो फिर वही ठँडा बिस्तर
वही भयानक खामोशी ।

पहले तुम जब मिलती थी तो,
मेरी आँखें खुशी से बरस उठती थी
अब तो उनसे खुन टपकता है ।
मेरे अंतर में जो घाव है
वह जब बजबजाकर रिसने लगता है
तो,मेरा दिल चित्कार उठता है

मुझे मेरे दिल का रोना, कराहना
और धडकन का काँपना-थऱथऱाना
साफ सुनाई देता है ।
अब तक तो तुम्हारे इंतजार की परीक्षा में,
मैं पास होता रहा–
गर अब परीक्षा लोगी,
तो हार जाऊँगा …

मुझे इन तन्हाईयों  से कोई सारोकार  नहीं
अब तुम आ जाओ……
क्योंकि,तुम्हारी बहुत याद आती है !

Regards,
Holy~Devil

तुम आई हो

“खिड़की का परदा हिलता है और लगता है तुम आई हो
जब जब दिल धड़कता है लगता है तुम्ही समायी हो

मेरी सांसो जी गर्मी में, गीतों में ,गजल, तरानो में
नयनों के उमंगो में या उनके घायल क्रंदन में
मेरी मदहोश तरंगों में, रग रग में तुम्ही समाई हो
मेरे ख्वाबो के सावन में तुम रिमझिम बनकर आई हो

नए शहर में जब मैं आया तुम बिन बहुत अकेला था
ख़ुद में मैं था लीं मगर तुम्हरी यादों का मेला था
हर चेहरे में तुमको ढूंढा,भीड़ में ख़ुद को तनहा पाया
एक झलक तुम्हरी मिल जाती, पल पल ताकता आस लगाया

पुरवा की बयार से पूछा, हर मौसम से हाल तुम्हारा
चाँदनी रातों से पूछा, पंछी से पूछा पता तुम्हारा
हर अनजाने चेहरे में तुम्हारी ही तलाश रही
सपनो में तुम आओगी, इतनी बाकी आस रही.

जब भी सुंदर नयनो से मेरी नयने टकराई
बलखाती अठखेलियों वाली,बस तुम ही तो याद आई

भीड़ में तनहा खड़ा हुआ एक मधुर संगीत सुना
मन यूँ चंचल हो बैठा,जैसे की तुमने गया हो

1st क्लास की खिड़की से महिला डब्बा को निहारता हूँ
टिकेट खिड़की की कतारों में पल पल तुमको ढूंढ़ता हूँ
एक दिन यु बस में बैठा,एक भीनी सुगंध हवा ने लायी
आँखे छल छल हो बैठी शायद तुम हो अब आई

internet पर जब भी बैठा तुम्हारा नाम ढूंढ़ता रहा
एक असीम बिश्वास से तुमको ही पूजता रहा
जब भी आँखे उनींदी होती, सपनो को बुलाता हूँ
सपनो में तुम आती हो, अद्भुत सुख में पता हूँ

हर दर्द में खुसी में बस तुमको ही मैं गाता हूँ
जीवन के हर अहसास में तुमको ही निभाता हूँ

इस जीवन का मोल न जानू तुम बिन बहुत अधुरा हूँ
तुम ही मेरा आदि -अंत हो तुमसे ही मैं पुरा हूँ ”

(written on: 16 Aug 2008

Completed on: 16 Feb 2009)

Cheers

Holy-Devil

कुछ लघु कवितायें

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प्रेम निमंत्रण

यह प्रेम निमंत्रण करता हूँ
ये सजनी तुम स्वीकार करो
पनघट को छोड़ राधा आवो
इस मुरारी से श्रृंगार करो
इस प्रेम पुंज की लौ को आवो
हम मिलकर कुछ तेज करें
यह प्रेम दिवस है आवो
हम मिलकर प्रेम अनंत हरें.

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रूप रंग

इन्द्रधनुष ने सातों रंग दीए
चंदन ने सुगंध दी देह को
और परियों सा रूप लिए
मेरी महबूबा जमीं पर आई
ऐसा रूप जिसे देख कर
ना जाने कितने कलमें पढ़ दीए जायें
फ़िर भी न जाने क्यों ऐसा लगता है
जैसे बात अभी अधूरी है ….

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मेरा चरित्र

यह चरित्र है मेरा कलंक में सना
न जाने कौन से मिटटी से मैं बना
हर बार सोचता हूँ अब पाक हो जाऊँ
पागल उस ने बनाया कैसे मैं सजाऊं
वो माफ़ करदे मुझको तक़दीर बदल लूँ
कालिख में पुती ये तस्वीर बदल लूँ

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मेरी माँ की ममता

मेरी माँ की ममता
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वही मेरी जिंदगी हैं, वही मेरा आशियाना हैं
उनके बिना कैसा जीना कैसा मर जाना है
दीपक की तरह जलती है वो, रौशन होता है मेरा जहाँ
वही है मेरी धरती, वही है मेरा आस्मान
उनके जलने से रौशन होता हूँ मैं
उनके सुगंध से महकता हूँ मैं
उनको पौधा ख़ुद को फूल कहता हूँ मैं

अब यही एक आस है कुछ कर दिखाना है
उनके लिए बहुत जी लिया अब मर दिखाना है

रचनाकार : अरुण भारती ” घायल परिंदा “

बांसुरी चली आवो

बांसुरी चली आवो
स्नेह ही निमंत्रण है
शब्द शब्द दर्पण है
प्रेम की एक प्रेरणा है
एक यही विश्वास है

उस परी की प्रेरणा है
सुर सजाता जाता हूँ
छबि है उसकी अनोखी
हर तान छेड़ जाता हूँ

बांसुरी को होठ की तलाश है
मोरनी को बादलों की प्यास है

है अमर यह प्रेम
मैं इसका निमंत्रण करता हूँ
बस तुम्हारे प्रेम पर मैं
प्राण अर्पण करता हूँ

तुम न आई आज सजनी
सुर सजा ना पाउँगा
शब्द साथ छोड़ देंगे
गीत गा न पाउँगा
रचनाकार : अरूण भारती ” घायल परींदा

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