सवर्ण और दलित

सवर्ण और दलित
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लिखना तो बहुत कुछ चाहता हूं लेकिन कुछ बातें। 65 हजार वेतन और 8 बीघा जमीन वाला सवर्ण गरीब है। जबकि भारत में 7% से कम लोग ही इतना कमाते हैं। लगभग 10% या उससे भी कम की संख्या परन्तु भारत के 95% सभी ताकतवर पदों पर सदियों से विराजमान है, वो सवर्ण है। इस देश में हजारों विश्विद्यालय हैं। लेकिन विरले ही आपको कोई दलित इनका प्रिंसिपल, वाईस चांसलर इत्यादि मिलेगा। स्वर्ण वह है जो एक कमजोर के मूँछ रखने पर उसकी टांग तोड़ देता है, उसके घर की औरतों के साथ वाहियात हरकतें करता है, शादी में घोड़ी चढ़ने पर उसके परिवार का जीना हराम कर देता है।

सवर्ण अभागा है, से बड़ा कटाक्ष नहीं हो सकता। समय की धुरी है,चल रही है, सब बदलेगा। और पढ़ा लिखा सवर्ण तो वह है जो अखबार में इश्तिहार देता है कि मुझे वर या वधू फलाना जाति और गोत्र की चाहिए। जो लोग इस तरह की बातें लिखते हैं वो न्यूजपेपर ठीक से नहीं पढ़ते। या पढ़ते हैं पर नजर नहीं आता, या नजर देना नहीं चाहते। हर दिन का अखबार कम से कम 2 अपराध लेकर निकलता है जो तथाकथित सवर्ण ने दलित, गरीब के खिलाफ किया होता है।

यदि हम सच में इंसान हैं तो, इंसान की नजर से हर वाक्या देखें।

मैं यह सब लिखता हूँ क्योंकि मेरा मानना है कि यदि आपमें समझ है, परख है तो आप भी लिखिये। इसका कतई यह मतलब न निकालिये की मैं किसी जाति या सम्प्रदाय विशेष से मन मैला रखता हूँ। मेरे सभी मित्र जानते हैं कि मैं कौन हूँ और कैसा हूँ।

जिस विषय पर मैं लिखता हूँ, महत्वपूर्ण वह विषय है। मैं गौण हूँ, सन्देश मुखर है। मुझे XYZ समझिये, और पढ़िये की XYZ, न जिसकी कोई जाति है, न धर्म, वह बस एक निर्जीव संदेशवाहक है, ने ऐसा लिखा है। फिर आपको मजा आयेगा और शायद विद्वेष या भ्रम नहीं होगा।

यदि फिर भी आपको मेरी लिखी बातें पसन्द नहीं आती, समझ नहीं आती, तो मुझसे नजर फेर लें। तत्काल मुझे अनफॉलो करिये, हटाईये। क्योंकि मैं भी कुछ हद्द तक कंगना रनौत जैसा हूँ। वो लगातार बोलती हैं। मैं लिखता हूँ। और अच्छी बात यह है कि मैं कोई नशा भी नहीं करता। बस मेरी जितनी समझ है उतना सच लिखने, सुनने और सुधार करने की ललक और जुनून है। मेरी कर्मभूमि अलग है। मेरी तर्कभूमि अलग है। स्वागत है आपका। अच्छा ही लगूँगा। देर सवेर !

: अरुण भारती”चिंतित”

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कंगना रनौत और सुशांत का न्याय

कंगना रनौत और सुशांत का न्याय

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कंगना रनौत :
On ODD days : मुझे बहुत बुरा लगता है जब कोई मोदी जी का सम्मान नहीं करता। वो इस देश के PM हैं।
On Even days : उद्धव ठाकरे, तुझे क्या लगता है !
एक दिन में कई शब्दों का प्रयोग। कश्मीरी पंडितों का दर्द समझ सकती हूँ। मेरा घर राम मंदिर है। बाबर के लोगों ने बाबरी मस्जिद बना दी। मुंबई पाकिस्तान हो गया। जय श्री राम !
यह महिला कुछ बड़ा ही खरनाक चीज लेती है। जिससे यह इतना बोलती है। व्हाट्सएप का ज्ञान लेकर। या तो यह पागल है या इसके पीछे बहुत बड़ी ताकत है। जिससे इसको इतनी हिम्मत मिल रही है। यु नो हु।
48 करोड़ के घर मे रहकर, लोगों को टैक्स पेयर के पैसे को बर्बाद करने का ज्ञान देने वाली, बिना किसी वाजिब डर के, Y कैटेगरी की सेक्युरिटी ले रही है, एक स्टेटस सिम्बोलिस्म के लिये।
मामला शुरू हुआ था, सुशांत के लिये न्याय मांगने से। उसका कत्ल हुआ है।नेपोटिसम के कारण। जी भर कर सबको गालियाँ मिली। मैंने भी दी गालियाँ। लेकिन कुछ दिनों में ही लग गया कि मैं गलत हूँ। मेरा गुस्सा जायज है, लेकिन सुशांत की मौत का कारण क्या है नहीं पता।
कंगना ने बोलना शुरू किया। पायल रोहतगी ने बोलना शुरू किया। हर ऐरा गैरा केस सुलझाने में लग गया। कोई पुनीत वशिष्ठ है, जिसके एक फेसबुक पोस्ट ने हंगामा मचा दिया। जब मामला लीगल हुआ तो उसने पोस्ट के नीचे लिख दिया फोरवर्डेड। उसकी जिम्मेदारी खत्म।
सुशांत के परिवार ने केस दर्ज किया। कि उसकी हत्या हुई है। 15 करोड़ का हेर फेर हुआ है। रिया उसकी GF थी, वो फँस गयी। फिर शुरू हुआ घिनौना खेल। पता चला कि वो ड्रग लेता था, एक दशक से मानसिक बीमार था। 15 करोड़ भी नहीं मिले थे उसे। नेपोटिसम का शिकार भी नहीं था। रिया फसती गयी। राजनीति का मोहरा बन गयी। और उसका परिवार जेल में है।
केस हुआ था हत्या और पैसे की लूट का। बन गया ड्रग का। यदि रिया उन सब की तरह ड्रग लेती है और अकेले जेल में है, तो क्या सुशांत की आत्मा को शांति मिलेगी? क्या उसकी आत्मा उसे माफ़ कर पायेगी, जिसकी फूंकने की वजह से एक परिवार को सूली पर चढ़ाया जा रहा है।
इस पूरे मामले में कंगना केवल अपनी रोटी सेंकती रही। वो बोलती है। कुछ भी बोलती है। लगातार बोलती है। उसे लगता है कि उसको बहुत कुछ पता है। ऐसा अक्सर व्हाट्सएप वाले ज्ञानी के साथ होता है। उसने मणिकर्णिका की तो उसे लगता है वो झाँसी की रानी है। वह भूल गयी कि वह कोठे वाली रज्जो भी बनी थी। सौ चूहे खा कर बिल्ली चली हज को।
इस पूरे हो हल्ला में, सुशांत का मामला पीछे हो गया। कंगना ने इसे हाईजैक कर लिया। अपने न्याय और अन्याय का मामला बना दिया। महाराष्ट्र सरकार को गालियां दी। क्रिटिसिज्म ठीक है। लेकिन जहाँ से तुमने अपना वजूद बनाया उसे पाकिस्तान कहना बेशर्मी की इंतेहा है।
कंगना यह भूल गयी है कि राजनीति में कोई भी दुश्मन या दोस्त नहीं होता। राजनीति में 2 प्लस 2 कभी 4 तो कभी 3 तो कभी 2 भी होता है। उसे लगता है कि अमित शाह, मोदी और भाजपा का IT सेल मेहरबान है। बिल्कुल है। क्योंकि GDP 24% गिरा है, कोरोना से लाखों लोग ग्रसित हैं, करोड़ो लोग बेरोजगारी और भुखमरी से।
अब थाली और ताली बजाना काम नहीं आ रहा। अर्णब, सुधिर, रुबिका, नाविका, अंजना, अमिश, रजत, दीपक इत्यादि अपना 24/7 काम कर रहें हैं। ताकि मुद्दों पर बात न हो। इसमें सबसे मुखर अभी कंगना है।
लेकिन कल किसने देखा है। कल को अमित शाह और उद्धव ठाकरे एक साथ मातोश्री में काश्मीरी पुलाव और पंजाबी रायता खाते मिल जायेंगे। उस दिन कंगना को अपने इश्तेमाल होने का अहसास होगा। उस दिन उसे आदित्य पंचोली अच्छे लगेंगे। और गुस्से से सिर फटने को होगा।
राजनीति घाघ लोगों का खेल है। यदि कंगना को लगता है कि वो समझ गयी है। तो यह उसकी नीरा मूर्खता है। राजनीति समझने के लिये इसमें उतरना जरूरी है। तभी मोल भाव समझ में आयेगा। संजय दत्त, अमिताभ बच्चन जैसे मेगा स्टार अपना हाथ आजमा चुके हैं। फिर अपनी रंगीन नकली दुनिया में वापस चले गये।
कंगना का भ्रम भी देर सवेर टूटेगा। और अरमान के टूटने पर बहुत दर्द होता है। उम्मीद है कि यह दर्द सुशांत जैसा न हो।
तब तक आप कंगना नाम की नई राखी सावंत और ड्रामा क़वीन के जुमलों और गमलों का लुत्फ उठाइये।

गिद्धों का ज़मीर

गिद्धों का ज़मीर
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हाथों में कैमरा लेकर,
जुबान पर जमीर लेकर,
समाज के खेवनहार,
उम्मीद का दीया जलाते थे।

आज तड़के, दिनदहाड़े,
सैकड़ो कैमरे के साथ,
एक लड़की को नोचते,
गिद्धों का झुंड देखा ।

गिद्ध, कभी विलुप्त नहीं होते,
वो, अपना आकार प्रकार बदलते हैं।
मैंने देखा है उन्हें,
कभी सफेद कुर्ता पायजामा,
कभी खाकी वर्दी और बन्दूक,
कभी हाथों में हथौड़ा और सामने कठघरा,
या स्टूडियो, सड़क पर कैमरे के साथ,

गिद्ध जिंदा रहते हैं।
बस लाशें बदलती हैं!

“आश्रम” सीरीज

#Ashram Series on MXPlayer

आश्रम सीरीज में बॉबी देओल काशीपुर वाले बाबा के टाइटल रोल में हैं। बॉबी देओल ने जबरदस्त आकर्षण शक्ति वाला रोल किया है।

उनका साथ दिया है, चंदन सान्याल ने, भोपा का रोल करके। चंदन सान्याल इतने जबरदस्त कलाकार हैं कि वो उस पंक्ति में बैठने लायक हैं जहाँ मनोज वाजपेयी, पंकज त्रिपाठी और नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी जैसे लोग हैं। काश! ये गैंग्स ऑफ वासेपुर में होते। मजा आ जाता।

साथ के सभी कलाकारों ने जबरदस्त अभिनय किया है। त्रिधा चौधरी, दर्शन कुमार, तुषार पांडे, अदिति सुधीर पोहनकर, अनुप्रिया गोयनका और सचिन श्रॉफ इत्यादि ने अपने किरदार में जान डाल दी है।

आश्रम अंधविश्वास, जाति वाद से सताए लोगों को अपने जद में लेता है। और फिर उनके जीवन का कायापलट हो जाता है।

आश्रम एक तरह से आसाराम और राम रहीम के तरह के बाबाओं के रूप में अपराधियों के मायाजाल का आईना है।

भक्त अक्सर मासूम और मूर्ख होते हैं। मूर्ख को सम्पूर्ण विनाश के बाद ही समझ आता है कि उसने गलत आदमी की भक्ति की। तब तक उसका सब कुछ लूट गया होता है। और उसकी जद में जो भी आता है, उसका भी सब कुछ बर्बाद होता है।

आश्रम में कैसे एक अपराधी अपने को सबका कल्याण करता हुआ बाबा काशीपुर वाला बनता है। कैसे वो मासूम पर अपना शिकंजा कसता है। कैसे औरतों और लड़कियों को नशा खिलाकर और भरम जाल में डालकर अपनी हवस का शिकार बनाता है। इसमें यह सब दिखाया गया है।

हर आसाराम और आश्रम कि एक झलक है इसमें !

जरूर देखें !

इंसानी खून

हिरणों और मोरों का,
कोई धर्म नहीं होता साहिब।

मैं धार्मिक नफरत का सौदागर हूँ,
मुझे इंसान में ही,
अपनी खेती दिखती है।
इंसानी खून को,
मैं सीढ़ी बनाकर
इतना ऊपर पहुंच जाता हूँ,
जहाँ न उनकी रुदन सुनाई देती है,
न उनका श्राप या संताप
कुछ बिगाड़ सकता है मेरा।

मेरे संबल हैं वो करोड़ो लोग,
जो उतने ही नफरती,
और जहरीले हैं।
लेकिन उनके यहाँ भी,
पालतू जानवरों से,
बहुत प्यार किया जाता है।
मेरी ऊर्जा और ऑक्सीजन,
के स्रोत हैं, शक्ति है, मुक्ति हैं।

मैं एक धर्मयुद्ध लड़ रहा हूं
मेरी नफरत ही मेरा नश्तर है!

राम मंदिर, राजनीति और मोदी

5 अगस्त को राममंदिर का भव्य भूमि पूजन हुआ। नरेंद्र मोदी और सारे बड़े नेता वहाँ पहुंचे। देश भर में रामभक्तों ने उत्सव मनाया। सारे टीवी चैनल धार्मिक चैनल बन गए थे।इसी बीच कोरोना केस लगभग 20 लाख पार हुआ और देश में कोरोना से मरने वालों की संख्या लगभग 42 हजार पार हो गई। रोज लगभग 50 हजार से ज्यादा केेेस आ रहे हैं।

लेकिन प्रश्न है कि जनता फिर इतना आनंदित क्यूँ है ? इस त्यौहार में वो प्रवासी मजदूर भी शामिल हैं जिनकी जिंदगी तबाह हो गयी।
इन सबका उत्तर है धर्म और उसका नशा। आदमी को नशे की लत लग जाये तो सब दुःख सुख भुला कर उसे वही अच्छा लगता है। इसमें प्रचारक, प्रचार तंत्र का दोष है? बिल्कुल है !
यदि इतना ही भव्य हॉस्पिटल या यूनिवर्सिटी या रिसर्च लैब खुलता, तो क्या मीडिया इतना उत्सव मनाता, लोग इतना तवज्जो देते?आप मोदी और भाजपा को दोष देकर खुश हो सकते हैं। लेकिन असली जड़ जनता है। क्या वो इतना खुश होती ये सब देखकर ?
याद रखिये, जब दुनिया में लाखों लोग मर चुके हैं और मर रहे हैं तब मंदिर,मस्जिद,चर्च और गुरुद्वारे बन्द थे , हाथ ऊपर कर लिया था ईश्वर ने, अल्लाह ने।
इंसान के काम आते हैं यूनिवर्सिटी, अस्पताल, रिसर्च सेंटर इत्यादि। धार्मिक स्थल धर्म और डर के व्यापार के गढ़ हैं।
एक अनंत पॉवर में आस्था रखिये, जिसने ब्रह्मंड बनाया और चलायमान रखा है। यह तय है कि वो इन जगहों पर नहीं रहता। यहाँ तो हर तरह के सुकर्म और कुकर्म होते हैं।
और अंत में :
“बोलो, सियावर रामचंद्र कि जय”#RamMandir #RSS #BJP #Hinduism #Religion #Hindu #NarendraModi #Advani

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