धरती के रिश्ते धरती और मुझ में एक बात खास है. हमारे ज़ीने के अंदाज़ पास पास हैं. तुम्हारे पास सूरज की धुप है और चंदा की शीतलता है. मेरे पास उसके होठों की गर्मी और छुवन की कोमलता है. तुम्हारे पास शहर हैं तो गाँव भी हैं. मेरे पास तुम हो तुम्हारी यादों के छावं भी है. धरती तुम्हारे पास हरियाली है तो सुखा भी है. मैंने उसके अंतस को और विरह को देखा भी है. तुम्हारे पास कलकल करती नदियाँ है,लोगों का अम्बार है. मेरे पास उसके नैन अश्रु है,उसका अन्छुवा सा प्यार है. तुम इतराती हो तुम्हारे पास कश्मीर है. मेरे पास वो पूरा है सशरीर है. तुमको गर्व है की संसद है महल है. मैं खुश हूँ मेरे पास ताजमहल है. तुम्हारे पास संघर्ष है तो प्रेम भी है. मैं उसका आस हूँ वो मेरा नेम भी है. धरती मुझे उससे भी प्यार है तुमसे भी प्यार है. हमारे सुख दुःख एक हैं,हम अच्छे यार हैं. -------------(अरुण भारती 'चिंतित')
तुम मीडिया वाले हो.
तुम मीडिया वाले हो.
सत्ता के जुमले पढ़ते हो.
भाषा इनकी अपनी गाथा गढ़ते हो.
इनकी गलियों में चरते हो.
इनकी काली करतूतों को,
श्वेत रंग करते हो.
वेश्यालय में बैठ कर,
कुंवारा दंभ भरते हो.
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(अरुण भारती ‘चिंतित’)
न मैं कविता गढ़ता
तुम मेरे पास होती तो ये खास होता. गर तुम उदास होती तो मैं उदास होता. न तुम तन्हा सहती,न मैं तन्हा रहता. न तुम कविता पढ़ती,न मैं कविता गढ़ता. ------------- अरुण भारती 'चिंतित'
लाश पर होली न खेलो
हे मनु,विद्या बुद्धि में तुम सबसे श्रेष्ठ हो.
प्रभु के भी पुत्र तुम तो ज्येष्ठ हो.
सभ्य तुम हो,सभ्यता का लाज रख लो.
श्रेष्ठ तुम हो,श्रेष्ठ भी समाज रख लो.
छोड़ दो सब स्वार्थ,सब जीवों को संभव प्यार दो.
लाश पर होली न खेलो,सम्मान का अधिकार दो.
मैं हर उस नस में बसा,जिसपर तुम्हारी धार चली.
मैं हूँ कायल प्यार का,पर तुम चले अपनी गली.
— अरुण भारती ‘चिंतित’
मेरे मन में रावण बसते, बसते मन में राम हैं.
मेरे मन में रावण बसते, बसते मन में राम हैं.
अक्सर दोनों लड़ते रहते,लड़ना इनका काम है.
राम जी जब हारते हैं,मन में क्रंदन होता है.
रावण जब भी हारता,घनघोर गर्जन होता है.
अक्सर दोनों लड़ते रहते,लड़ना इनका काम है.
राम जी जब हारते हैं,मन में क्रंदन होता है.
रावण जब भी हारता,घनघोर गर्जन होता है.
मेरा मन निर्झर की भाती,अबाध गति से चलता है.
रामजी धक्का खाते रहते,रावण मंद मंद हँसता है.
हर तरफ रावण ही रावण,राम जी अल्पसंख्यक हैं.
राम जी हारे रावण जीते, ये संकट का सूचक है.
रावण का अट्टहास देख कर, चिंतित जी घबराते हैं.
इस विजय दिवस पर लो भैया, मन में भी आग लगाते हैं.
—————— अरुण भारती ‘चिंतित’
एक तरफ मतवाली तुम हो
एक तरफ मतवाली तुम हो
एक तरफ दारू की बोतल,एक तरफ मतवाली तुम हो.
एक तरफ है चखना चटपट, एक तरफ रसवाली तुम हो.
एक तरफ अंगूरी रस है, एक तरफ गुलाबी तुम हो.
एक तरफ तीखी सांसे हैं, एक तरफ कस्तूरी तुम हो.
एक तरफ बोतल की घनघन,एक तरफ पायल की छनछन.
एक तरफ पैग की झंझट, एक तरफ सागर बिन तट.
एक तरफ बदसूरत बोतल,एक तरफ सुडौल बदन तुम.
एक तरफ फूहड़ गाने हैं, एक तरफ मीठी कोयल तुम.
एक तरफ गन्दा मदिरालय, नख-शिख तक तुम शीशमहल हो.
एक तरफ मटमैली चादर, अंग अंग से तुम मखमल हो.
कौन भला मदिरालय जाये,पैसे की अब बली चढ़ाये.
अधरों से अब छू लेने दो,नैनों से अब पी लेने दो.
अंकपाश में बांध लो,पल में सदियाँ जी लेने दो.
इस नशे से चिंतित जी जीवन भर पार न पाएंगे.
जग से वैरागी होकर,तुम्हरे मदिरालय आयेंगे.
—– अरुण भारती ‘चिंतित’