इश्क और समंदर की लहरें

इश्क और समंदर की लहरें
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इश्क और समंदर की लहरें,
एक समान असर करती हैं.
इनमें डूबने का मन करता है.
इनमें डूबने से डर लगता है.
लेकिन इनका प्रवाह तीव्र होता है.
तेजी से बहा लेता है अपने वेग से.
फिर कहाँ अपना अस्तित्व बच पता.
फिर तो ना होश काम आता है,
ना काम आता है सोच या तजुर्बा.
बस चुप चाप बहते जावो.
भूलकर खुद को असर सहते जावो.

यही सुख का चरम है.
डरो नहीं ये बस भरम है.
ये अल्लाह का करम है,
की तुम इश्क पाश में हो,
या हो लहर के आगोश में.

जीवन जीने का यही श्रेष्ठ उपाय है.
स्वर्ग सुख ही बस दूजा पर्याय है.

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Copyright @ Arun Bharti

ये मिज़ाजे इश्क हैं

दिल करता तुमको नशीली ग़ज़ल लिखूं.
नाजनीन कहूँ या खिलता कमल लिखूं.
चांदनी कहूँ या ताजमहल लिखूं.
बेवफा कहूँ या वफ़ा का पल लिखूं.
हूर कहूँ या उर्वशी का दल लिखूं.

ये मिज़ाजे इश्क हैं,इश्क के आगोश में हूँ.
इश्क को महक लिखूं या कोई दलदल लिखूं.

@ Arun Bhati

इम्तिहान लेती रहो

वो मुझे कसम देती हैं सच बोलने की

और खुद ही वक़्त पे बिखर जाती हैं.
ना भूलेंगे ये वादा देती हैं.
अगले ही पल मुकर जाती हैं.
सजदा करू मैं उनका ये आस रखती हैं.
बेवफा होकर भी मुझसे प्रेम का विश्वास रखती हैं.
नशे की हालत में समझ बैठी हैं.
कोई भी करवट मोड़ दे इतनी वो ऐठी हैं.
सनम तुम्हे बेवफा कहें,बेअकल कहें या कहें बदतमीज़.
इम्तिहान लेती रहो देंगे वफ़ा का,तुम हो ही अज़ीज़.

घरवाली- बाहरवाली

घरवाली- बाहरवाली


चेहरे पे सौम्यता आँखों में लाज की लाली हो,ऐसी मेरी घरवाली हो.
चेहरे पे शरारत नैन नशे की प्याली हो,ऐसी वो बाहरवाली हो.
घरवाली ऐसी हो की
साड़ी से जो खुश हो जावे,पति सेवा बस ध्यान में लावे.
जींस टॉप से दूर रहे जो,पूज्य हैं आप ये कहे जो.
जितने चाहूँ उतने बच्चे जन दे,हर पल अपना तन मन दे.
सास ससुर को खीर खिलावे,मम्मी के वो पावं दबावे.
फ़ोन से मेरे दूर रहे, पैसों से मजबूर रहे.
भजन कीर्तन का शौक हो, चारदीवारी बस उसकी रौनक हो.
परपुरुष जिसको पाप लगे, उमदराज लोग बाप लगे.
चाय से लेकर भोजन तक सबका उसको ध्यान रहे.
शारीरिक भूख से सात्विक भूख तक सबका उसको सम्मान रहे.
फिगर से लैला ना भी लगे पर मन से वो सावित्री हो.
मजाक की बातें भाये जिसको थोड़ी सी कवियत्री हो.
मेरे लक्ष्य में जिसकी नैया पार लगे.
उसकी आँखों में धुन हो मेरी,बस मेरा वो प्यार लगे.
जिसके वंश में संस्कृति मन में संस्कार हो.

मेरे चरणों की दासी हो बस मेरा अधिकार हो.
बाहर वाली ऐसी हो की
जींस टॉप को खास कहे वो या उससे भी कपडे कम हों.
रिश्ते की ना बात करे वो, इमोशनल लफड़े कम हों.
फास्ट फ़ूड में मस्त रहे,मेरी बाँहों में पस्त रहे.
दारू सुट्टा जिसको भाये,जब भी बुलावूँ तब आ जाये.
अमीर बाप की बेटी हो,सब मेरे बिल देती हो.
सारी किस्म की फिल्में देखे,मेरे तन को खूब निरेखे.
फिगर हो जिसकी अच्छी खासी,बॉडी को बस दे शाबासी.
बिना शादी के साथ रहे,जो जी चाहे दिल खोल कहे.
फ्यूचर की जिसको चिंता न हो,मेरे नाकामी पे शर्मिंदा न हो.
हर बातो को कुल कहे,गधे को ब्यूटीफुल कहे.
दिन रात मस्ती दे ऐसी, गांजे की ऐसी की तैसी.
चिंतित हूँ इस बात को लेकर, किसको पकडूं किसको छोडूं.
एक मिठाई एक नमक है दोनों से ही रिश्ता जोडूं.
 

तुम बिन रह नहीं पाते

ये कुदरत का खेल कैसा है की तुम बिन रह नहीं पाते.
प्रेम अगन है दलदल है ये खुद को कह नहीं पाते.
तुम जब साथ रहती हो दिल फूलों की क्यारी लगता है.
जब तुम दूर रहती हो तो जीना भी भारी लगता है.

————-(अरुण भारती ‘चिंतित’)

धरती के रिश्ते

धरती के रिश्ते 

धरती और मुझ में एक बात खास है.
हमारे ज़ीने के अंदाज़ पास पास हैं.

तुम्हारे पास सूरज की धुप है और चंदा की शीतलता है.
मेरे पास उसके होठों की गर्मी और छुवन की कोमलता है.

तुम्हारे पास शहर हैं तो गाँव भी हैं.
मेरे पास तुम हो तुम्हारी यादों के छावं भी है.

धरती तुम्हारे पास हरियाली है तो सुखा भी है.
मैंने उसके अंतस को और विरह को देखा भी है.

तुम्हारे पास कलकल करती नदियाँ है,लोगों का अम्बार है.
मेरे पास उसके नैन अश्रु है,उसका अन्छुवा सा प्यार है.

तुम इतराती हो तुम्हारे पास कश्मीर है.
मेरे पास वो पूरा है सशरीर है.

तुमको गर्व है की संसद है महल है.
मैं खुश हूँ मेरे पास ताजमहल है.

तुम्हारे पास संघर्ष है तो प्रेम भी है.
मैं उसका आस हूँ वो मेरा नेम भी है.

धरती मुझे उससे भी प्यार है तुमसे भी प्यार है.
हमारे सुख दुःख एक हैं,हम अच्छे यार हैं.

-------------(अरुण भारती 'चिंतित')

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