I dedicate this poem to the people of the world who feel for the humankind,and to the blessings of Geeta Madam & Vinay Sir,and to the love of the people who consider that I could write, AND to the inspiration of terrific poetry of Ramdhari Singh Dinkar ji & Harivansh Rai Bachchan ji. I am Happy !
अब कुकृत्य कौन सा बाकी है
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जो जाति का दंभ लिए ले जांघ ठोक चलते हैं
वो कर्म से ऊपर जन्म का दान लिए चलते हैं
वो मनुज पापी के मोक्ष का पतवार लिए चलते हैं.
है कलियुग यह, कल छल से सबपे वार किया जाता है.
खून सींच,धर शीश-माल वसुधा का श्रृंगार किया जाता है.
यहाँ विजय पात फहराने को,हर युक्त जुटाते लोग सभी
कर बंधू -बांधव का शीश हरण,होते हैं मोद प्रमोद सभी.
कर नर वध,औ कर पशु वध ऊँचे नाम हमारे होते हैं.
हो लोक-लुलुप हर पाप करें,पुनीत ये काम हमारे होते हैं.
क्या हार जीत,क्या स्वर्ग नरक,किसको मिलता है पुण्य-धाम
क्यूँ सोचें इतना नर नश्वर,क्यों करना कोई धर्म-नाम.
क्या सचमुच हम कुछ सभ्य हुवे, जब मनुजत्व शर्माता है
पशु झुण्ड देख ये बर्बरता, उर-मन ही बहुत अकुलाता है.
सहस्त्रों सहस्त्र वर्षो पहले जब हम आखेट किया करते थे
ले नग्न देह,हर पशु प्राण अपना उदर भरा करते थे
पत्थर से आग जलाते थे,पत्थर ही शत्रु पर ढाते थे
तबसे लेकर इस काल तक,हमने गहन शोध-संधान किया
सब चल-अचल संसाधन ने वर्चस्व हमारा मान लिया.
है क्लांत मन,है भीत आत्म,रे मनुज क्या अद्भुत काम किया.
ना पशु रहा,ना मनुज रहा,रे बर्बर होकर क्या बेजोड़ नाम किया.
अम्बर भी तेरा त्रास सहे,वसुधा सिसके उर-नीर बहे
त्रिलोकी सृष्टि रचेता भी,प्रलाप में अकथ हर वचन कहें
अब कुकृत्य कौन सा बाकी है,दर दर पे पाप का अनल जले
क्यूँ दिनकर अब अस्त न होते हैं,क्यूँ शीतल होकर चाँद जले.
क्यूँ मंद पवन मोदक होते,क्यूँ मौसमी सभी बयार चले.
अब कौन कुकर्म रह बाकी है,क्यूँ श्रष्टि का अंत नहीं होता.
क्यूँ सागर होकर उन्मत समग्र धरती को नही भींगा देता.
है मन मलिन,उर कांप रहा,चंहु और बर्बरता नाच रही !
क्या जीवन है,या शाप कोई,या काल सभी को बांच रही.
न शब्द का सोता सूखता है,हर एक पोर सब दुखता है.
हे नाथ,मुझे हर लो वसुधा का क्रन्दन ना अब देखा जाता.
अनगिन ग्रन्थ लिखूं,ना तब भी मनुज पाप लेखा जाता.
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Copyright@ Arun Bharti
bahut badhiya bhartiji .. kya shabd istemal karte hai ..ati sunder 🙂
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