माना की सब झूठ का शहर है

माना की सब झूठ का शहर है
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जिनको सहूलियत है सोहबत है
पैसों की ताक़त की रुतबे की
उनके लफ्ज़ बड़े सलीक और
झूठ में तराशे से होते हैं.

जो फ़कीर है उसके पास
जलालत है ज़मीर है फक्र है
तीखी जुबां और कडवे बोल
लेकर झूठ के बियावान में
अकेले दरदर में भटकते हैं.

जो ऊँचे ओहदे पे होकर तुम
सच को तोड़ने मरोड़ने जोड़ने
का हर विकल्प पाते हो.
परदे के पीछे सच का थप्पड़ खाकर
सामने झूठ पहन इतराते हो.

आत्मा मरती नहीं अमर है
माना की सब झूठ का शहर है
पर ये जहर पीकर दर्द से
बिलबिलाओगे तुम
कभी ना कभी सच से हारकर
कुछ तो अंतरात्मा की
सुन पाओगे तुम,

तभी रामराज्य होगा
तभी तेज़ का साम्राज्य होगा !
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Copyright@ Arun Bharti

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