क्या कविता मुझसे अब छुट गयी है ?
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बरबस बैठूं सोचूं अक्सर अब
क्या कविता मुझसे अब छुट गयी है ?
चिंतन करूँ गहन आकलन करूँ
क्या शब्द का सोता सुख गया है ?
यूँ उथल पुथल है निज जीवन में
करुणा दया और प्रेम भरे
सब भाव विचरते इस आँगन में
छल कपट से लेकर निश्छल स्नेह
सब रस का पान भी करता हूँ
बर्बर मानव के पशुता के
कर्मकांड सभी तो पढता हूँ.
चिड़ियों के कलरव, जल का कलकल
मादक सौन्दर्य, मासूम हलचल
बूढ़े हाथ,बेबस अबला, जर्जर ममता
ऐश्वर्य,मोटापा, जन्मजात अन्धता
रिश्तें की दरकन से संस्कारों के मरने तक
हर दृश्य का दर्शन करता हूँ,
लोभ मोह से हवस हबस तक
जर जोरू से भ्राता बध तक
सूरा से लेकर सुर लहरी तक
करुण क्रंदन से हर्ष नीर तक
धर्म भेद से मतभेद तक
जाति प्रथा से वेश्या प्रथा तक
हर एक नियम पढता हूँ.
फिर भी अँखियाँ हो ज़ार रो रही
सुर में कम्पन धमनी चलने में विवश हो रही
हे वीणावादिनी ! मुझसे मेरे शब्द ना छीनो
प्रेम वंदना करता हूँ और नेम तुम्हारे धरता हूँ
निष्कपट निरंतर चंचल शिष्यत्व समर्पण करता हूँ.
—– Arun Bharti 03 May 2012
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