अच्छी लगती हो
सावन की रिमझिम में
भींगे गेशुं लिए
अल्हड अदाओं से
जब इतराती हो तुम
अच्छी लगती हो.
पंकज नयनों से मुस्कुराकर
रेशम सी लटों को
यूँ चेहरे पर गिराकर
अपनी कस्तूरी सांसों से
जब मदहोश करती हो तुम
अच्छी लगती हो.
दुपट्टे के कोने को
होठों से दबा
कनखियों से देख
जब मुस्कुराती हो तुम
अच्छी लगती हो.
जब मैं देखता हूँ तुम्हे
यह देखकर शरमाते हुवे
दुपट्टे का पल्लू
जब ठीक करती हो तुम
अच्छी लगती हो.
चांदनी रातों में
जब छत पर मुझे
चुपके से बुलाती हो तुम
बहुत अच्छी लगती हो.
————-अरुण भारती ‘चिंतित’
# written in period of “ANALOG ELECTRONIC Circuits class (20 October 2005 )
sir , bahut khoob prastuti ki hai ……
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Kya baat hai, apne purane form mein aa rahe ho… 🙂
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