Tragic Loss of a Talented IIT Student

Shaon Malik was just 21 Yrs of age.

He was a topper of his batch of the electrical engineering at IIT Kharagpur. He was in 3rd year. He was academically gifted and used to score 9+ cgpa. For the reference , my cgpa was between 6-7.5 for the entire duration of BTech. He was part of Bengali Dramatics society and was very active in extra-cocurricular activities.

😭He was found hanging by the iron grill of the window of his hostel room.

He was a resident of Azad Hall of Residence. It is just near the trinity of Azad, Patel and Nehru halls.

❤️‍🩹It breaks my heart to read such news. What could have been wrong with the boy. He looked neither academically stressed nor lonely.

✍️Indian education system and society have to look within and stop pressuring our sons and daughters to such high expectations.

Really disturbed reading this news.

ये कौन सा अंधड़ हो तुम तुम्हारे वेग में यूँ खो रहा हूँ

ये कौन सा अंधड़ हो तुम तुम्हारे वेग में यूँ खो रहा हूँ
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संग चलने से बड़ा संगीन कुछ होता नहीं
एक मत होने से और रंगीन कुछ होता नहीं.
जो चलूँ संग हाथ थामे सहस्त्र नजरे सवाल पूछें
जो नजर भर देख लें समाज में बवाल गूंजे

भ्रम का बंधन बेड़ियों में लोग कुंठित हो रहे
रिश्तों के चिथड़ों समेटे सभ्य बनकर रो रहे
नित्य दिन एकल सा जीना जीने से उबास आये
नदी सा बेबाक चलना शौक कुछ ऐसे ही भाए

मोह का बंधन कठिन है जीने के तंतु तुम बने जो
प्राण में,धमनी में,मन में, लक्ष्य में तुम सने जो
संसार दरिया तैरना था अब तुम बने मझधार मेरे
असभ्य सा जीना था अब तुम बने श्रृंगार मेरे

हर नियामत तोड़ने थे अब तुम नियम सिखला रहे हो
वैराग्य के खोजी को तुम मादक रस चखा रहे हो
नशे की हालत में हूँ ये कौन से पथ पे चला हूँ
संसार सुख को छोड़ना था रंगीनियाँ मथने चला हूँ

निज नियम को तोड़ कर अंतर भाव विह्वल हो रहा हूँ
मन से लेकर ज्ञान में तुम्हारी ही हलचल हो रहा हूँ
स्वर्ग सा कुछ पा रहा हूँ अपने अंश तुममे खो रहा हूँ
अपने धरम को छोड़ कर तुम सा ही धार्मिक हो रहा हूँ.
तुमसे पुण्य सारे पा रहा हूँ पिछले पाप सारे धो रहा हूँ
ये कौन सा अंधड़ हो तुम तुम्हारे वेग में यूँ खो रहा हूँ

तुम जो अपलक  देखती हो आत्मा में दीप जलते
जड़ पड़े जर्जर पड़े अरमानों के सौभाग्य खुलते
अंक में जब घेरती हो धड़कने भी थम से  जाते
नख से लेकर शिख तक हर तंत्र है उत्सव मनाते

तुम ही मेरा स्वर्ग हो तुम ही मेरी धाम हो
तुम ही मेरा पुण्य हो तुम ही कर्म निष्काम हो
तुम ही राज्याभिषेक हो तुम ही विश्व विजय हो
तुम ही कुरुक्षेत्र हो तुम ही धनञ्जय हो
तुम ही मेरा जन्म हो तुम ही मेरा मरण हो
तुम हो मेरा अस्तित्व हो तुम ही अन्तःकरण हो

मोक्ष का लक्ष्य था वैराग्य था खोजने चला
तुम सा पवित्र प्रेम पा संसार में अब डूबने चला
कौन जाने इस पल से अगली साँस तुम बिन झेल पाऊँ
भगवन के चौसर और प्रपंच को क्या खेल पाऊँ
पल में सदियाँ जी रहा हूँ तुम सा जो अमृत मिल गया
निष्प्राण भटके पुष्प को सृजक सा माली मिल गया

हे प्रभु विनती है तुमसे जो अपनी संगिनी है चुन लिया
वरदान दो,आशीष  दो जो अपना भविष्य मैंने बुन लिया.
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