नीतीश, रामविलास और अवसरवाद

नीतीश, रामविलास और अवसरवाद
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बिहार के दो सबसे बड़े नेता, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान, दोनों ही हद्द दर्जे के अवसरवादी और पलटू। इनका न अगड़ा से लेना है, न पिछड़ा या दलित से, न इनको कट्टर हिंदूवाद से दिक्कत है, न धर्मनिरपेक्षता से।

नीतीश ने एक्सट्रीम लेफ्ट के साथ भी सरकार बनाई है और एक्सट्रीम राइट विंग वाले संघ से भी इश्क़ लड़ाया है। इनका न कोई मोरल है और न कोई आत्मा। गोधरा दंगा के समय नीतीश चुप रहे, लेकिन मोदी और संघ से घिन्न होने का ढकोसला भी किया। बिना पेंदी के लोटा की तरह।

नीतीश का मकसद है कि उनको येन केन प्रकारेण CM की कुर्सी चाहिए। इसलिए इनको कुर्सी कुमार भी बोलते हैं। जब तक RJD पावर में था संघ और दंगों का विस्तार बिहार में लगभग नदारद था। 1990 के समय राम मंदिर मूवमेंट, जो भाजपा के राजनीतिक रोटी सेंकने का जबरदस्त हथियार था और पूरा देश साम्प्रदायिक हिंसा और ध्रुवीकरण की चपेट में था, लालू यादव के कारण बिहार में अछूता था। संघ परिवार अपना शिविर बढ़ा नहीं पाया, लगा नहीं पाया।

नीतीश के समय अब लगभग 4000 संघ के नए शिविर खुले हैं। जहां ध्रुवीकरण की उम्मीद ज्यादा हो वहीं यह अपनी नई शाखा खोलते हैं। अक्सर मुस्लिम बहुल इलाकों के आस पास के गांवों और क्षेत्र में। नतीजा है कि बिहार में अब धार्मिक उन्माद ज्यादा है, और छुटपुट दंगे अक्सर होते रहते हैं। लालू यादव वह कील हैं जो संघ की तेज चाल में चुभते हैं।

जे है से कि, राम विलास पासवान राजनीतिक मौसम के प्रकांड विद्वान। उनको पता होता था कि हवा का रुख किधर है। उधर ही हो लेते थे। कई सारे PM के अंदर मंत्री रहे। उनका मकसद मंत्री बनना था।

नितीश कुमार भी छोटे मौसम वैज्ञानिकों में आते हैं। लेकिन ये मौसम बदलने वाले भी हैं। इनके जैसा बिना मोरल का CM ढूंढने से नहीं मिलेगा। इनसे ज्यादा कायर भी। इनका आजतक कोई स्टैंड क्लियर नहीं रहा।

ये वहीं हैं, जिन्होंने कहा था : “मिट्टी में मिल जायेंगे, लेकिन भाजपा के साथ हाथ नहीं मिलायेंगे”. अब देखिए, RJD के सौतन के साथ हनीमून मना रहे हैं।

नीतीश कुमार बिना रीढ़ की हड्डी वाले राजनेता हैं !

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राम मंदिर, राजनीति और मोदी

5 अगस्त को राममंदिर का भव्य भूमि पूजन हुआ। नरेंद्र मोदी और सारे बड़े नेता वहाँ पहुंचे। देश भर में रामभक्तों ने उत्सव मनाया। सारे टीवी चैनल धार्मिक चैनल बन गए थे।इसी बीच कोरोना केस लगभग 20 लाख पार हुआ और देश में कोरोना से मरने वालों की संख्या लगभग 42 हजार पार हो गई। रोज लगभग 50 हजार से ज्यादा केेेस आ रहे हैं।

लेकिन प्रश्न है कि जनता फिर इतना आनंदित क्यूँ है ? इस त्यौहार में वो प्रवासी मजदूर भी शामिल हैं जिनकी जिंदगी तबाह हो गयी।
इन सबका उत्तर है धर्म और उसका नशा। आदमी को नशे की लत लग जाये तो सब दुःख सुख भुला कर उसे वही अच्छा लगता है। इसमें प्रचारक, प्रचार तंत्र का दोष है? बिल्कुल है !
यदि इतना ही भव्य हॉस्पिटल या यूनिवर्सिटी या रिसर्च लैब खुलता, तो क्या मीडिया इतना उत्सव मनाता, लोग इतना तवज्जो देते?आप मोदी और भाजपा को दोष देकर खुश हो सकते हैं। लेकिन असली जड़ जनता है। क्या वो इतना खुश होती ये सब देखकर ?
याद रखिये, जब दुनिया में लाखों लोग मर चुके हैं और मर रहे हैं तब मंदिर,मस्जिद,चर्च और गुरुद्वारे बन्द थे , हाथ ऊपर कर लिया था ईश्वर ने, अल्लाह ने।
इंसान के काम आते हैं यूनिवर्सिटी, अस्पताल, रिसर्च सेंटर इत्यादि। धार्मिक स्थल धर्म और डर के व्यापार के गढ़ हैं।
एक अनंत पॉवर में आस्था रखिये, जिसने ब्रह्मंड बनाया और चलायमान रखा है। यह तय है कि वो इन जगहों पर नहीं रहता। यहाँ तो हर तरह के सुकर्म और कुकर्म होते हैं।
और अंत में :
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