मेरी माँ की ममता
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वही मेरी जिंदगी हैं, वही मेरा आशियाना हैं
उनके बिना कैसा जीना कैसा मर जाना है
दीपक की तरह जलती है वो, रौशन होता है मेरा जहाँ
वही है मेरी धरती, वही है मेरा आस्मान
उनके जलने से रौशन होता हूँ मैं
उनके सुगंध से महकता हूँ मैं
उनको पौधा ख़ुद को फूल कहता हूँ मैं
अब यही एक आस है कुछ कर दिखाना है
उनके लिए बहुत जी लिया अब मर दिखाना है
रचनाकार : अरुण भारती ” घायल परिंदा “