इंसानी खून

हिरणों और मोरों का,
कोई धर्म नहीं होता साहिब।

मैं धार्मिक नफरत का सौदागर हूँ,
मुझे इंसान में ही,
अपनी खेती दिखती है।
इंसानी खून को,
मैं सीढ़ी बनाकर
इतना ऊपर पहुंच जाता हूँ,
जहाँ न उनकी रुदन सुनाई देती है,
न उनका श्राप या संताप
कुछ बिगाड़ सकता है मेरा।

मेरे संबल हैं वो करोड़ो लोग,
जो उतने ही नफरती,
और जहरीले हैं।
लेकिन उनके यहाँ भी,
पालतू जानवरों से,
बहुत प्यार किया जाता है।
मेरी ऊर्जा और ऑक्सीजन,
के स्रोत हैं, शक्ति है, मुक्ति हैं।

मैं एक धर्मयुद्ध लड़ रहा हूं
मेरी नफरत ही मेरा नश्तर है!

ये पीड़ा का कीड़ा सबको नित दिन काटे है

ये पीड़ा का कीड़ा सबको नित दिन काटे है
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कोई आरक्षण से पीड़ित है कोई जातिवाद से
कोई स्वर्ण होकर पीड़ित है कोई दलितवाद से
कोई भविष्य से पीड़ित है कोई इतिहास से
कोई समता से पीड़ित है कोई तिरस्कार से

कोई हिंदुत्व से पीड़ित है कोई कठमुल्ला से
कोई ॐ से पीड़ित है कोई अल्ला से
कोई त्रिशूल से पीड़ित है कोई अजान से
कोई हिन्दू से पीड़ित है कोई मुसलमान से

जनता नेता से पीड़ित है नेता जनता से
संसद चुनाव से पीड़ित है चुनाव संसद से
कोई घोटाले से पीड़ित है कोई पर्दाफाश से
कोई घुस से पीड़ित है कोई अथक प्रयास से
कोई मोटापे से पीड़ित है कोई रोटी की तलाश से

निजी क्षेत्र सरकारी से पीड़ित है सरकारी निजी क्षेत्र से
कोई फ़ौरन निकाला जाये कोई बैठ कुर्सी तोड़े
कोई धारदार इंग्लिश बोले कोई गड़बड़ घोटाला जोड़े
कोई बाज़ार से पीड़ित है कोई संस्कार से
कोई आधुनिकता से पीड़ित है कोई आडम्बर से

शहर गाँव से पीड़ित है गाँव शहर से
दिन रात से पीड़ित है रात दिन से
धुप छावं से पीड़ित है छावं धुप से
कोई बदशक्ल होकर पीड़ित है कोई रूप से

कोई बलात्कार से पीड़ित है कोई व्यभिचार से
कोई व्यापार से पीड़ित है कोई पवित्र प्यार से
कोई आतंक से पीड़ित है कोई दमन से
कोई छुटकारे से पीड़ित है कोई हनन से

भगवन इन्सान से पीड़ित है इन्सान भगवन से
कोई अहंकार से पीड़ित है कोई आत्म सम्मान से
आग पानी के नमी से पीड़ित है पानी आग के ताप से
कोई बाप बेटे से पीड़ित है कोई बेटा अपने बाप से

दिल दिमाग से पीड़ित है दिमाग दिल से
प्रेमिका हवस से पीड़ित है प्रेमी बिल से
कोई हिंदुस्तान से पीड़ित है कोई पाकिस्तान से
कोई सुनामी से पीड़ित है कोई रेगिस्तान से

ये पीड़ा का कीड़ा सबको नित दिन काटे है
प्रेम से लेकर घृणा तक सबने सबको बाटें है
अज़ब खेल है दुनिया का बरबस चलता जाये
हंसी से लेकर रुदन तक सबको सबकुछ भाए
कौन है ख़ूनी कौन निर्दोष कैसे इसका न्याय करें
सभी पीड़ित हैं भेद करने में क्यूँ वक़्त बर्बाद करें.
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