कटेंगे तो बटेंगे

वो तुम्हें अलग अलग,
नारों में उलझा रहा है,
और अपनी नाकामियों को,
बहाने से झुठला रहा है।

उसे बस तुम्हें ग़रीबी और,
जीवन के संघर्ष में उलझाना है,
धर्म के कट्टरवाद में,
एक दूसरे को लड़ाना है।

उसे बस कुर्सी पाना है,
नए झूठ का जुगाड़ लगाना है
और अपने अमीर दोस्तों का ,
लाखों करोड़ माफ करवाना है ।

इतने में ही उसकी कहानी है,
झूठ और नफ़रत ही दाना पानी है ।

: बिहारी चौपाल

कंगना रनौत और सुशांत का न्याय

कंगना रनौत और सुशांत का न्याय

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कंगना रनौत :
On ODD days : मुझे बहुत बुरा लगता है जब कोई मोदी जी का सम्मान नहीं करता। वो इस देश के PM हैं।
On Even days : उद्धव ठाकरे, तुझे क्या लगता है !
एक दिन में कई शब्दों का प्रयोग। कश्मीरी पंडितों का दर्द समझ सकती हूँ। मेरा घर राम मंदिर है। बाबर के लोगों ने बाबरी मस्जिद बना दी। मुंबई पाकिस्तान हो गया। जय श्री राम !
यह महिला कुछ बड़ा ही खरनाक चीज लेती है। जिससे यह इतना बोलती है। व्हाट्सएप का ज्ञान लेकर। या तो यह पागल है या इसके पीछे बहुत बड़ी ताकत है। जिससे इसको इतनी हिम्मत मिल रही है। यु नो हु।
48 करोड़ के घर मे रहकर, लोगों को टैक्स पेयर के पैसे को बर्बाद करने का ज्ञान देने वाली, बिना किसी वाजिब डर के, Y कैटेगरी की सेक्युरिटी ले रही है, एक स्टेटस सिम्बोलिस्म के लिये।
मामला शुरू हुआ था, सुशांत के लिये न्याय मांगने से। उसका कत्ल हुआ है।नेपोटिसम के कारण। जी भर कर सबको गालियाँ मिली। मैंने भी दी गालियाँ। लेकिन कुछ दिनों में ही लग गया कि मैं गलत हूँ। मेरा गुस्सा जायज है, लेकिन सुशांत की मौत का कारण क्या है नहीं पता।
कंगना ने बोलना शुरू किया। पायल रोहतगी ने बोलना शुरू किया। हर ऐरा गैरा केस सुलझाने में लग गया। कोई पुनीत वशिष्ठ है, जिसके एक फेसबुक पोस्ट ने हंगामा मचा दिया। जब मामला लीगल हुआ तो उसने पोस्ट के नीचे लिख दिया फोरवर्डेड। उसकी जिम्मेदारी खत्म।
सुशांत के परिवार ने केस दर्ज किया। कि उसकी हत्या हुई है। 15 करोड़ का हेर फेर हुआ है। रिया उसकी GF थी, वो फँस गयी। फिर शुरू हुआ घिनौना खेल। पता चला कि वो ड्रग लेता था, एक दशक से मानसिक बीमार था। 15 करोड़ भी नहीं मिले थे उसे। नेपोटिसम का शिकार भी नहीं था। रिया फसती गयी। राजनीति का मोहरा बन गयी। और उसका परिवार जेल में है।
केस हुआ था हत्या और पैसे की लूट का। बन गया ड्रग का। यदि रिया उन सब की तरह ड्रग लेती है और अकेले जेल में है, तो क्या सुशांत की आत्मा को शांति मिलेगी? क्या उसकी आत्मा उसे माफ़ कर पायेगी, जिसकी फूंकने की वजह से एक परिवार को सूली पर चढ़ाया जा रहा है।
इस पूरे मामले में कंगना केवल अपनी रोटी सेंकती रही। वो बोलती है। कुछ भी बोलती है। लगातार बोलती है। उसे लगता है कि उसको बहुत कुछ पता है। ऐसा अक्सर व्हाट्सएप वाले ज्ञानी के साथ होता है। उसने मणिकर्णिका की तो उसे लगता है वो झाँसी की रानी है। वह भूल गयी कि वह कोठे वाली रज्जो भी बनी थी। सौ चूहे खा कर बिल्ली चली हज को।
इस पूरे हो हल्ला में, सुशांत का मामला पीछे हो गया। कंगना ने इसे हाईजैक कर लिया। अपने न्याय और अन्याय का मामला बना दिया। महाराष्ट्र सरकार को गालियां दी। क्रिटिसिज्म ठीक है। लेकिन जहाँ से तुमने अपना वजूद बनाया उसे पाकिस्तान कहना बेशर्मी की इंतेहा है।
कंगना यह भूल गयी है कि राजनीति में कोई भी दुश्मन या दोस्त नहीं होता। राजनीति में 2 प्लस 2 कभी 4 तो कभी 3 तो कभी 2 भी होता है। उसे लगता है कि अमित शाह, मोदी और भाजपा का IT सेल मेहरबान है। बिल्कुल है। क्योंकि GDP 24% गिरा है, कोरोना से लाखों लोग ग्रसित हैं, करोड़ो लोग बेरोजगारी और भुखमरी से।
अब थाली और ताली बजाना काम नहीं आ रहा। अर्णब, सुधिर, रुबिका, नाविका, अंजना, अमिश, रजत, दीपक इत्यादि अपना 24/7 काम कर रहें हैं। ताकि मुद्दों पर बात न हो। इसमें सबसे मुखर अभी कंगना है।
लेकिन कल किसने देखा है। कल को अमित शाह और उद्धव ठाकरे एक साथ मातोश्री में काश्मीरी पुलाव और पंजाबी रायता खाते मिल जायेंगे। उस दिन कंगना को अपने इश्तेमाल होने का अहसास होगा। उस दिन उसे आदित्य पंचोली अच्छे लगेंगे। और गुस्से से सिर फटने को होगा।
राजनीति घाघ लोगों का खेल है। यदि कंगना को लगता है कि वो समझ गयी है। तो यह उसकी नीरा मूर्खता है। राजनीति समझने के लिये इसमें उतरना जरूरी है। तभी मोल भाव समझ में आयेगा। संजय दत्त, अमिताभ बच्चन जैसे मेगा स्टार अपना हाथ आजमा चुके हैं। फिर अपनी रंगीन नकली दुनिया में वापस चले गये।
कंगना का भ्रम भी देर सवेर टूटेगा। और अरमान के टूटने पर बहुत दर्द होता है। उम्मीद है कि यह दर्द सुशांत जैसा न हो।
तब तक आप कंगना नाम की नई राखी सावंत और ड्रामा क़वीन के जुमलों और गमलों का लुत्फ उठाइये।

बिहार : मुश्किलें और मज़बूरी

कल ये लिख रहा था. डायरेक्ट फेसबुक पर. फ़ोन हैंग हुआ और मैं खिन्न हो गया. फिर से कोशिश।
ये बात थोड़ी अचंभित करेगी आपको लेकिन सत्य है. मैंने दुनिया ज्यादा नहीं देखी  है.जब भी कहीं जाने का मौका मिलता है, वो जगह नयी होती है मेरे लिए. मैं जहाँ भी जाता हूँ, खुश और दुखी होता हूँ. वहां की अच्छाई लिखता हूँ और साथ ही अपने बिहारी होने का दर्द भी. यकीं मानिये ये दर्द बहुत भयानक होता है.
सब लोग कहते हैं की बिहार पिछड़ा है, बिहारी देश विदेश मजदूरी करने जाते हैं. इसमें सबकुछ सत्य है. इसलिए ज्यादा चोट करता है. BIMARU states में बिहार, MP, UP, और राजस्थान आते हैं. बिहार तथाकथित जंगल राज के लिए जाना जाता है. MP वह राज्य है जो बलात्कार, अब तक के सबसे भयानक हत्या के syndicate वाला VYAPAM और आदिवासियों के उत्पीड़न के लिए जाना जाता है. राजस्थान जाटों का गढ़ है, जहाँ भंवरी देवी जैसी विश्व कुख्यात घटनाएँ हुवी हैं. यहाँ अक्सर दलितों का उत्पीड़न जाटों द्वारा, की न्यूज़ आती है. UP पिछले एक दो साल से ज्यादा चर्चा में है. 2017 ज्यादा दूर नहीं है. western UP जाटों का गावं है. वहां न्यूनतम अधिकार भी नहीं है गरीब और दलितों के पास. 2013 में दंगे में जो मुस्लमान मारे गए वो बहुत गरीब और खेतिहर मजदुर थे. हरियाणा तो खैर हमेशा से उदंड रहा है ऐसे मामलों में.
बिहार की बात करें तो यहाँ जाति आधारित नरसंहार हुआ है. मेरे बहुत से मित्र हैं जिनके रिश्तेदार रणवीर सेना में थे।  इन पढ़े लिखे लोगों को भी कतई अफ़सोस नहीं रहा है. लालू यादव जो “ललुआ”, ” भलुआ” हुआ करते हैं बड़कों के लिए, ने ऐसा कुछ किया है जो वहां रहने वाला और भुक्तभोगी ही समझ सकता है. जहाँ क्रिमिनल को दबंग कहा जाये और सीना तान कर परिचय कराया जाये, वहां से एक ग्वाले का बेटा गरजता है तो बहुत दबे कुचले का सीना चौड़ा हो जाता है. यदि आप दूसरी  तरफ के हैं तो  आपको यकीं नहीं होगा, मुझे गाली भी देंगे और बेवकूफ कहेंगे। सब शिरोधार्य है.
लालू ने सामाजिक संरचना को बहुत सलीके से समझा है. इसी का नतीजा है की सब exit पोल फेल हो जाते हैं और इनका 190 सही हो जाता है. निसंदेह लालू ने चारा घोटाला किया. लेकिन जगनाथ मिश्रा को लोग भूल जाते हैं. लालू corruption के सिंबल हैं. क्यों ? क्या व्यापम इससे बड़ा नहीं है ? नयी नयी आई पंकजा मुंडे ने 200 करोड़ का चपत लगाया उसकी चर्चा है ? कलमाड़ी का 75000 करोड़, राजस्थान का 4 लाख करोड़, जोगी, तेलगी को भूल जाते हैं. बंगारू को भूल जाते हैं. बोफोर्स को भूल जाते हैं. मधु कोड़ा को भूल जाते हैं. खानदानी corrupt मारन परिवार, करूणानिधि परिवार को भूल जाते हैं ? मराठा क्षत्रप शरद पवार की हजारों कंक्रीट की इमारतों को भूल जाते हैं जो मुंबई में चमक रही हैं. यह वो इंसान है जो world sugar trade को 2 मिनट तक रोक सकता है. फिर लालू ही सबसे भ्रष्ट क्यों ?
कारण है. दोगली मीडिया। जहाँ आज भी बड़कों की पकड़ है. लालू जिसे openly मंच से गाली देते थे। यह सच है की बिहार को अंधेर करने में इनके गुर्गों का बड़ा हाथ है. शोरूम से गाड़ियां निकल लेते थे, लोगों का शाम के बाद निकलना खतरे से खाली नहीं था. मुझे नफरत थी इस इंसान से.लेकिन बड़े होने पर बहुत कुछ पता चला है. पवार पर कोई हाथ क्यों नहीं लगाता ? क्यूंकि वो भी जेटली की तरह लामबंदी का माहिर खिलाडी है.
अब आते हैं की अब लालू वापस आये हैं लाव-लश्कर के साथ तो क्या डरने की जरुरत है ? मेरे ख्याल से नहीं। क्यूंकि ये उनके survival का सवाल था. उनको सिख मिल चुकी है. ज़माना बदल गया है. हमेशा डाल-डाल और पात-पात  के खेल में आगे रहने वाले को इतनी समझ जरूर है. कमान अब तेजस्वी के हाथों में सौपा जा चूका है और अब मोदी की रथ यात्रा देशभर में निकालने को ये देशी दबंग तैयार है. इसका आगाज़ बनारस से होना है जहाँ के गंगा मैया को छला है बड़बोले मोदी ने.
लालू ने बिहार को तब हाईजैक किया था जब राबड़ी देवी को थोपा था. इस जले से उबरे नहीं थे की बिहार का विभाजन हो गया. बच गया केवल खेत खलिहान वाला बिहार. और अनिश्चितता। धन्यभाग की नितीश मिले और पटरी साफ़ हो रही है.
बिहार पिछड़ा है और कई जगह ये गाली जैसा है. इसमें कोई दो राय नहीं है. आज भी हर शहर में बिहार के बंधू मिल जायेंगे। रिक्सा चलते, फुटपाथ पर सोते, और बदतर हालत में रहते। ट्रैन में भीड़, मेट्रो में भीड़, मुंबई लोकल ट्रैन में भीड़ सब जगह देखें जा सकते हैं. लेकिन यह भी है की सबसे ज्यादा IAS, इंजीनियर, डॉक्टर, IITians भी हमारे बन्धु हैं. हम पॉश या एवरेज से अच्छी जगह रहते हैं, काम करते हैं, लोकल लोगों को रोजगार देते हैं, उनके रोटी का इंतेज़ाम करते हैं। जब हम गन्दी बस्ती से गुजरते हैं तो नाक पर रुमाल रख लेते हैं. दिल्ली में ढाबा पंजाबी चलाते हैं, ठेली वो भी लगाते हैं. और दिन भर मख्खी मारते रहते बेरोजगार मकान मालिक इन मजदूरों के शोषण से अपने घर का चूल्हा जलाते हैं.दिल्ली सरकार इनके बुते बनि. लक्ष्मीनगर, मुख़र्जी नगर और JNU  हमारा है.लेकिन ये भी सच है की हमारे बिहारी मजदुर भाई को डांट और थप्पड़ पड़ता है और मजबूरन हमें चुप रहना पड़ता है.
कमी कहां है ? कमी है. हम लोगों में business सेंस कम है. हम नौकरी के पीछे भागते हैं. फिर पलायन और प्रवास कैसे रोक सकते हैं. गुजरात को जैन और गुजरातियों ने आगे किया. महाराष्ट्र को भी बनाया। देश के बड़े उद्योग पर साउथ इंडियन , मारवाड़ी, पंजाबी, जैन और ऐसे ही सब का कब्ज़ा है. बॉलीवुड भी पंजाबी, बंगाल और गुजराती चलाते हैं. मतलब, की कमी अपने में है. जब एक अच्छा खासा पढ़ा लिखा लड़का दिल्ली आता है तो आधी कमाई गुजर बसर करने में लगा देता है. वही, यहाँ का 15 साल का लौंडा business में हाथ लगाता है और जब पैसे कमाने लगता है तो तीर भेदता है की तुमने पढ़ के क्या कर लिया।
अब आते हैं मूल बात पर. बिहार में एक भी ऐसा शहर नहीं है जिसके साफ सुथरे और सुन्दर होने पर हमें नाज़ हो. हर राज्य में ऐसे अनेक शहर हैं जहाँ घूम कर अच्छा लगता है. कई तो BIMARU राज्य में हैं. नितीश जी ने पटना तक को अच्छा नहीं किया. वहां धूल ही धूल है. गांधी मैदान तो गन्दगी का सिरमौर है. ऐसा एक दो शहर तो बनायें कम से कम. यहां की शिक्षा व्यवस्था की बात आये तो नक़ल करते, चार-दिवारी फांदते लोग हमारी किरकिरी करते हैं. शिक्षा मित्र अनपढ़ से भी बदतर होने का प्रमाण देते हैं.
अब अंतिम बात. क्या सबके लिए लालू दोषी है ? नही. फिर उन बिहार केसरी और जननायक ने क्या किया ? उन्हें क्यों नहीं गाली देते ? यही जातिवाद है, जो हमें डुबो रहा है. जब देश 90 % पिछड़ों और दलितों का है तो बिहार कैसे अपवाद हो. उनके हित को धयान में रखने वाला कैसे नहीं जीतेगा ? क्या मोदी और उनके गुर्गे जीत जाते तो अच्छा था ? उनकी candidates की लिस्ट देखिए. एक नंबर के छटें हुवे गुंडे बदमाश को प्रत्याशी बनाया था. वो जीत कर आते तो क्या आतंक नहीं मचाते। क्या वो गुंडाराज नहीं होता। क्या वो जंगलराज नहीं होता। बिलकुल होता. साथ में होता मंदिर, गाय, गोबर और मुहफटो की नौटंकी। देश में क्या कम विकास किया है इन भज भाजियों ने ?
निष्कर्ष ये है की. बिहार का फेल होना आज का नहीं है. यह सोच का फेल होना है. collective failure है. एक बिहारी होने के नाते इसका उपाय ढूंढे और शर्म को ओढें. ना की ओछी मानसिकता और दम्भ के चूर होने का मातम मनाएं. इस हमाम में सभी नंगे हैं. सबसे ज्यादा नंगे वो हैं जो खून की खेती करते हैं और लाशों का नाश्ता करते हैं. उनकी जयकार करनी बंद करें। अच्छा और उचित पढ़े, ताकि सोच, इन नेताओं के झांसे में ना आये, ग़ुलाम ना हो !
एक बिहारी के नाते, मन में बहुत दुःख है की :
सबके घर में चोर हुवे पर सबका बहुत विकास हुआ
कैसे कैसे चोर हुवे, जो पाटलिपुत्र इतिहास हुआ !
साभार !
अरुण भारती “चिंतित”

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