नाज़ुक मन

ऐसे तो वक़्त कटता नहीं,
लेकिन मन बहला लेता हूँ।

तुम जाती हो जब कहीं दूर,
कई तरह का खाना बना लेता हूँ।

इस बार पांच दिन में पांच सब्जी बनाया,
बैगन भर्ता, मिक्स वेग, एग करी,आलू टमाटर,
और कढ़ाई पनीर में समय गंवाया ।

लोग कहते हैं कि बीबी मायके गयी है,
बढ़िया है, बैचलर लाइफ एन्जॉय करो।

उन्हें क्या बताऊँ, की उसके बिना तो,
नींद और सांस दोनों में तक़लीफ़ होती है।

मेरी कविता व्यावहारिक है,
और प्यार अनोखा ताजा है।

तुमसे कहता हूँ जल्दी आओ,
नाजुक मन का तकाजा है !

©अरुण भारती

Mood Swings in “poetry”

Coping with this fast paced corporate life has been very difficult  for me since June 2008 . That is the month when i joined my first company as an associate. This job life is taking toll on my creative abilities. I have reduced myself from writing long poems to these few liners. They represent my mood swing and emotion. So is the title of this article.
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हर कदम पर मौत की जिंदगी से लडाई है
परन्तु, जिंदगी ने जूझने की हिम्मत पाई है
अरमानो का न गल जाने दो फिसलन के डर से
असमान का कहो ऊँचा हो ले बाधाएं हटे डगर से

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उन कोमल सांसों की बिछुड़न,  उन चंचल नयनों का हसना
उन महके गेसुओं का सावन, बलखाती कटी का लचकना
भूल न पाऊं फिर भी, जीने की एक हसरत दे भगवन…
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क्यूँ विचलित कर जाती हो , जब एकाग्रचित हो मैं स्वप्न बुनता
प्रेम-पथिक बन जाने का या जग को सुखद बनाने का ,
इस भंवर जल में तुमको ढूंढ़ता या फिर जग की तृष्णा को !
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इन अखियों के असुवन में, मेरे घर की बगिया सींच गयी .
हे शीतल बयार जरा उनको बता, मेरे इश्क में इतनी तरावट है !
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हम इश्क से महरूम भी न रहे , हम इश्क से महफूज़ भी न रहे
इस नाचीज़ की पारो भी देहरी लाँघ कर आई थी कभी
मेरी सभ्यता की बेबसी को भांप ओ चली गयी
अब इस मजबूर को चंद्रमुखी की तलाश है !
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प्यार मुझको फूल से भी , प्यार मुझको शूल से भी /
फूल से अभिसार हो रहा, शूल से तकरार है /
एक फूल है आज देखी, उससे भी आँखें चार हैं /
कौन जाने , लोग कह दें , कैसा ये व्याभिचार है ?
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मुझे क्या पता था ?
गजल तो जुल्फें सवारतीं हैं ,
तराने तो धड़कन गुनगुनाती हैं
अफसाने तो नैनो की भूलभुलैया में बुनते हैं
मकड़ी के जाले से भी उलझे से
पर राधा कृष्ण के प्रेम से सुलझे से !
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Cheers,

Holy~Devil

तुम आई हो

“खिड़की का परदा हिलता है और लगता है तुम आई हो
जब जब दिल धड़कता है लगता है तुम्ही समायी हो

मेरी सांसो जी गर्मी में, गीतों में ,गजल, तरानो में
नयनों के उमंगो में या उनके घायल क्रंदन में
मेरी मदहोश तरंगों में, रग रग में तुम्ही समाई हो
मेरे ख्वाबो के सावन में तुम रिमझिम बनकर आई हो

नए शहर में जब मैं आया तुम बिन बहुत अकेला था
ख़ुद में मैं था लीं मगर तुम्हरी यादों का मेला था
हर चेहरे में तुमको ढूंढा,भीड़ में ख़ुद को तनहा पाया
एक झलक तुम्हरी मिल जाती, पल पल ताकता आस लगाया

पुरवा की बयार से पूछा, हर मौसम से हाल तुम्हारा
चाँदनी रातों से पूछा, पंछी से पूछा पता तुम्हारा
हर अनजाने चेहरे में तुम्हारी ही तलाश रही
सपनो में तुम आओगी, इतनी बाकी आस रही.

जब भी सुंदर नयनो से मेरी नयने टकराई
बलखाती अठखेलियों वाली,बस तुम ही तो याद आई

भीड़ में तनहा खड़ा हुआ एक मधुर संगीत सुना
मन यूँ चंचल हो बैठा,जैसे की तुमने गया हो

1st क्लास की खिड़की से महिला डब्बा को निहारता हूँ
टिकेट खिड़की की कतारों में पल पल तुमको ढूंढ़ता हूँ
एक दिन यु बस में बैठा,एक भीनी सुगंध हवा ने लायी
आँखे छल छल हो बैठी शायद तुम हो अब आई

internet पर जब भी बैठा तुम्हारा नाम ढूंढ़ता रहा
एक असीम बिश्वास से तुमको ही पूजता रहा
जब भी आँखे उनींदी होती, सपनो को बुलाता हूँ
सपनो में तुम आती हो, अद्भुत सुख में पता हूँ

हर दर्द में खुसी में बस तुमको ही मैं गाता हूँ
जीवन के हर अहसास में तुमको ही निभाता हूँ

इस जीवन का मोल न जानू तुम बिन बहुत अधुरा हूँ
तुम ही मेरा आदि -अंत हो तुमसे ही मैं पुरा हूँ ”

(written on: 16 Aug 2008

Completed on: 16 Feb 2009)

Cheers

Holy-Devil

कुछ लघु कवितायें

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प्रेम निमंत्रण

यह प्रेम निमंत्रण करता हूँ
ये सजनी तुम स्वीकार करो
पनघट को छोड़ राधा आवो
इस मुरारी से श्रृंगार करो
इस प्रेम पुंज की लौ को आवो
हम मिलकर कुछ तेज करें
यह प्रेम दिवस है आवो
हम मिलकर प्रेम अनंत हरें.

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रूप रंग

इन्द्रधनुष ने सातों रंग दीए
चंदन ने सुगंध दी देह को
और परियों सा रूप लिए
मेरी महबूबा जमीं पर आई
ऐसा रूप जिसे देख कर
ना जाने कितने कलमें पढ़ दीए जायें
फ़िर भी न जाने क्यों ऐसा लगता है
जैसे बात अभी अधूरी है ….

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मेरा चरित्र

यह चरित्र है मेरा कलंक में सना
न जाने कौन से मिटटी से मैं बना
हर बार सोचता हूँ अब पाक हो जाऊँ
पागल उस ने बनाया कैसे मैं सजाऊं
वो माफ़ करदे मुझको तक़दीर बदल लूँ
कालिख में पुती ये तस्वीर बदल लूँ

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बांसुरी चली आवो

बांसुरी चली आवो
स्नेह ही निमंत्रण है
शब्द शब्द दर्पण है
प्रेम की एक प्रेरणा है
एक यही विश्वास है

उस परी की प्रेरणा है
सुर सजाता जाता हूँ
छबि है उसकी अनोखी
हर तान छेड़ जाता हूँ

बांसुरी को होठ की तलाश है
मोरनी को बादलों की प्यास है

है अमर यह प्रेम
मैं इसका निमंत्रण करता हूँ
बस तुम्हारे प्रेम पर मैं
प्राण अर्पण करता हूँ

तुम न आई आज सजनी
सुर सजा ना पाउँगा
शब्द साथ छोड़ देंगे
गीत गा न पाउँगा
रचनाकार : अरूण भारती ” घायल परींदा

प्रेम प्रतिज्ञा

राहुल बाबू कैसे हैं आप ?
ठीक हूँ भाभी मैने कहा
नही तो आपकी आँखें तो झूठ कह रही हैं ?भाभी ने कहा
मेरी आँखों में आँसू भर आए.भाभी मेरे बगल में बैठ गयी
र्शमी की याद आ रही है ना?हाँ भाभी उसके बिना सायद मैं जी ना पाऊं….मैने कहा.
एसा नही कहते पगले..भाभी बोली.
मेरी प्रंपरिया र्शमी के बाद भाभी ही मेरी सबसे अच्छी दोस्त हैं.
उनसे आजतक कोई भी बात छ्छूपाई नही है
ओ बहुत प्यारी हैं मगर जब मुझे आप बोलती हैं तो छीड़ सी होती है मुझे.मैं घर में सबसे बड़ा हू.ओ पड़ोस की भाभी हैं तब भी मेरे रश्मी के ओर इनके तार जुड़े हुए हैं के इस पैर मेरा घर उस पैर भाभी का ओर उसके बगल में एक सफ़ेद मंज़िला इमारत है जहाँ मेरी रश्मी का जन्म हुआ था.
प्यारे से गुड्डे गुड़िया की तरह थे जब मेरी मा ओर पिनकी हम दोनो को साथ पलंग पैर लीटा देती.लोग कहते वाह क्या प्यारी जोड़ी है !!!
यह जोड़ी बदी हुई ओर सचूल जाने लगी का हैर पाठ हमने साथ में पढ़ा ओर गहरी दोस्ती का भी.

फिर समय ने करवत बदली.मैं पटना एक अवसूया विदयालया में आ गया.वह वही पढ़ने लगी.हम निम्न मध्यमवर्गिया परिवार से हैं सो लड़कियों को दूर पढ़ने नही भेजा जाता है मैं वापस लौटा तो ओ नकचड़ी लड़ाकू अब गयी थी.मैं भी पढ़कू ओर गंभीर गया था सो खुल कर बात करना बंद गया था.
काई बार हमारी आँखे चार हुई.मैं मुस्कुराया ओ भी मुस्कुराई प्र मुह से हम एक लफ्ज़ भी नही कह सके.

वह कपड़े सूखने या किसी बहाने छत पैर आ जाती और मुझे तिरचही नज़र से देखते हुए मुस्कुरा देती ओर शर्मा कर मेरे दिल में एक हलचल सी मचा देती.गवन में लड़कियाँ बदी जाती है तो उनसे मीलना काम जाता है पीनकी आंती से बाते करता बस उसे देख भर पाता था.

उस दिन तो ग़ज़ब ही गया.मैं बरामदे में बैठा था ओ अपने घर के दरवाज़े पैर खड़ी मुझे देख रही थी.पता नही क्या सोचकर मैने उसकी तरफ़ kiss उछाहली उसने भी kiss kiya और सरमती हुई अंदर चली गयी उस रात मुझे नींद नही आई.करवत बदलते बदलते रात भर कुच्छ सोचता रहा.सुबह जल्दी जगा.एक तस्वीर निकली जिसमीएन एक लड़का एक लड़की को kiss कर रहा था .एक love letter भी लिखा ओर ले कर पूजा भाभी के पास गया.

आरे राहुल बाबू आप ओर इतनी सुबह कोई ख़ास बात है क्या ??स्वाभाविक प्रस्न था ,क्यंकि मैं उनके घर बहुत ही क्म जाता था.
“जी भाभी,मुझे आपसे अकेले में कुच्छ बात करनी है मैने कहा.
“ओ तब तो ज़रूर कोई ख़ास बात है ” !!!
भाभी मैं र्शमी को बहुत चाहता हूँ क्या आप उसे ये letter दे देंगी ?? मैने सीधा सपाट कहा.
“ओ तो यह खिचड़ी पाक रही है तभी मैं सोची की ये MR. पढ़कू इतना खुस क्यों नज़र आते हैं !!!
क्ब से चल रहा है ये सब ??
“जी बचपन से ” मैने कहा.
“चुप बुढ़ु कहीं का,एसा भी कहीं होता है क्या “भाभी ने हस्ते हुए कहा.
“वैसे मुझपे इतना भरोसा क्यों ??? मैं आपकी मा को भी तो ब्टा सकती हूँ.
“पता नही क्यों ? लेकिन मुझे आपपे भरोसा है भाभी की तरफ़ देखा.उनकी आँखें मौन स्वीकृति दे रही थी.

ख़ैर यही से हमारे पत्रो का सीलसीला सुरू गया.हम दोनो छत पैर बैठ कर आँखो से दिल की बातें किया करते जिनका आईना हमारे पत्र बनते क्यी बार हम मिलते प्र दिल की बातें दिल में ही रह जाती.यह सिलसिला चार साल तक चला फ़ीर मैं IIT KHRAGPUR आ गया.वह I.Sc complete क्र कढ़ाई सिलाई सीखने लगी.

आख़िर कब तक चलता ये सिलसिला कभी ना कभी तो इसे टूटना ही था.मेरा IIT में 2nd yr. पूरा हुआ.गर्मी की छुट्टी में घर पहुँचा. हमेशा की तरह अपनी जान के दर्शन किया लेकिन उसके चेहरे पैर मैने गंभीरता की झलक देखी.अगले दिन भाभी के घर पहुँच तो रश्मी वहाँ पहले से ही बैठी थी.

“भाभी’ रश्मी यहाँ पहले से ही बैठी है मैं भी यहाँ बैठुंगा तो लोग तरह तरह की बाते कहेंगे.भाभी कुछ बोलती इससे पहले रश्मी ही बोल उठी.
“इतना डरते तो प्यार क्यों किया ??मैं चुप रहा.
भाभी बोली” ये आपका ही इंतज़ार कर रही थी आपसे मिलना चाहती है
“आप तो जानती हैं इस तरह मिलने से हम तीनो ही बदनाम जाएँगे ” मैने कहा.

ख़ैर तय हुआ की आगली रात को एक बजे मिलना है रात भर सो नही सका.उसके सबदों ओर आँखों की अधीरता मुझे बेचैन कर रही थी.
निर्धारित समय पैर मैं और वो मेरे घर के पिच्छे वाले कमरे में मीले.मेरा दिल धड़ धड़ कर रहा था.
“रश्मी..कैसी हो ?? मेरे मुह से पहला लफ्ज़ नीकला.
“बड़ी चिता है तुम्हे मेरी “वह रुआंसी होकर बोली.
“बोलो,क्या बात है ??? मैने कहा.
“तुम्हे कुच्छ पता भी है की मेरी शादी होने वाली है और तुम पूछते हो की क्या बात है ??तुम्हारे सिवा मैं किसी ओर के बारे में सोच भी नही सकती.राहुल मुझसे शादी कर लो.मैं तुम्हारे बिना जी नही पाऊगी.बोलते बोलते उसकी आँखों में आँसू भर आए.

मैं अवाक रह गया.
“रश्मी मैने भी तुम्हारे बिना जी नही सकता.लेकिन टुमए दो साल इंतज़ार करना पड़ेगा.हम अगर अभी शादी कर लेंगे तो सयदा किसी लायक नही रहेंगे.” मैं बोलता ही चला गया.
“राहुल, मैं किसी की परवाह नही करती हम लोग घर से भाग चलते हैं तो मैं म्र जौंगी.
“रश्मी, मुझे समझने की कोसिस करो अभी मैं कुछ नही कर सकता.नवंबेर में आऊंगा तब बात करेंगे इस प्र.
“मेरी धड़काने बढ़ गयी और आँखे न्म थी.”

“राहुल”…मेरे कंठ अवरुद्ध हो गाये और ओ मेरे गले लग्कर रोने लगी रगो में उफान आ गया.फिर हम दोनो अस्त व्यस्त हो ग्ये.फिर ओ हो गया जो होना नही चाहिए था और पूरी रात जैसे कुछ ही पलों में बीत गयी की चहचाहाठ ने हमीएन अपने अपने घरों की तरफ़ जाएँ को सावधान किया.

फिर वही लुका छिपी का खेल चलता रहा.छुट्टी बीती और मैं IIT आ गया.लेकिन मेरा मन यहाँ नही लगा.उसकी एक एक बात मुझे हतोड़े की तरह चोट कर रही थी.मियाने सोचा वह ज़्यादा भावुक है ठीक हो जाएगी. मुझे लगा की पलक झपकते ही घर पहुँच जाऊं.घर पहुँचा तो देखा उसके घर में शादी की तैयारियाँ जोरो प्र थी.

बस दो दिन बाद शादी थी.मैं सोच में पद गया.भाभी ने किसी तरह मुलाक़ात कराई.उसकी आँखे रोते रोते सूज़ गयी थी.

“रश्मी”..क्या हाल बना रखा है मेरी जान ..???मैं भी रूवन्सा हो गया.
“तुम नही समझोगे”..उसने बस इतना ही कहा और ऐसे देखा जैसे मेरी गहराई जान गयी हो….
पता नही क्यों मैं उसके गले लग्कर रोने लगा….
उसे लगा मैं बहुत असहाय हूँ.
और मेरी जान ने मुझे ऐसा सहर दिया जिसे मैं जन्म जन्म तक नही भूल पाऊँगा.
suicide note में लिखा था

“राहुल,तुमने मुझे प्यार करना सिखाया प्र नीभा ना सके.तुम कहीं ना कहीं कमज़ोर हो.बस तुम मुझे
छू सकते थे.
आशा करती हूँ की हम ह्र जन्म में दो शरीर एक जान रहेंगे.
तुम्हारी
(जान)
“हाँ जान मैं तुम्हारा हूँ और हमेशा ही तुम्हारा रहूँगा….”मैं बेजार होकर रोने लगा.
उसकी चिता से उठता धुआ मेरे मन के अंदर भी भर रहा था.

मेरा दिल भी उसमें समा गया.
“आह मेरी जान चली गयी और हम देखते ही रह ग्ये..!!!

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