भरे पड़े अख़बार हैं

जाति आधारित हत्या से,
भरे पड़े अख़बार हैं,
फिर भी ज़ालिम कहता है,
हिंदू एकाकार है।

मंदिर में प्रवेश नहीं है,
खाने में छुआछूत है,
शादी में भी जाति का,
देखने का भूत है।

तीस हज़ार तो जाति हैं,
अलग अलग तो माटी है।

पूरब पश्चिम अलग अलग हैं,
उतर दक्षिण अगल बगल हैं,
इतना देश विशाल हैं,
अलग अलग बोलचाल है।

जो हम सबको बांटें है,
वही तो हमको काटे है।

फिर भी कहता एक रहो,
गजब का ये व्यवहार है।

एक हाथ में तलवार है,
दूसरे में खूनी झंडा है।

अच्छा ये व्यापार है,
एकता का प्रचार है ।

: बिहारी चौपाल

हमें कचरा पसन्द है !

हमें कचरा पसन्द है!
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31 साल का तेजस्वी यादव अकेले नीतीश कुमार, सुशील मोदी, नरेंद्र मोदी, संघ संगठन और भाजपा जैसी विश्व की सबसे बड़ी पार्टी के 40 से 50 साल के पोलिटिकल कैरियर पर भारी पड़ता है।

लालू यादव परिवार में लाख बुराईयां हों, लेकिन यह भी सच हैं कि ये बुराईयां सब में है, और जिनका नाम ऊपर है उन लोगों से कम है। और सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने संघ के हाथी जैसे एजेंडे के आगे सिर नहीं झुकाया। ऐसी और पार्टी का नाम बताइये।

जगन्नाथ मिश्रा के समय से चला आ रहा घोटाला जो कुल जमा लगभग ₹900 करोड़ का था यदि सृजन घोटाले के ₹3000 करोड़ से अधिक है, मुज्जफरपुर के बालिका शेल्टर होम बलात्कार से जघन्य है तो फिर आपका गणित और चरित्र दोनों गड़बड़ है।

चारा खाये मिश्रा जी और चारा चोर हुवा यादव। क्योंकि संघ जैसे सांड को उसकी सिंग से पकड़कर पटकने वाला आजकल जेल में है। और उस सांड की हार से उन सबको दर्द होता था जो जातिवादी ऐड़ी उठाकर ऊँचा होते थे और सांड के तहसनहस करने पर उत्सव मनाते थे।

राजद, तेजस्वी और लालू यादव का चरित्र संघ से बेहतर है। और उनकी जेब में पड़ा पैसा संघ और उसके अगुवाई करने वालों से कहीं बहुत ही ज्यादा कम।

रही बात, भ्रष्ट और अपराधी की तो, मैं और मेरे कई सारे मित्र साफ सुथरा हैं। उन्हें टिकट कौन देगा, वोट कौन देगा।

इस देश को लोगों को पढ़ा लिखा बस वाद विवाद और कैरियर गाइड के लिये अच्छा लगता है। MLA, MP, CM और PM तो उन्हें उस डब्बे से चाहिये जिसमें खून है, जला हुआ सामान है, खोखा और पेटी है, तस्करी का बारूद है, और सेना के काम आने वाली AK47 है!

हमें कचरा पसंद है, लेकिन प्यार तो हम पढ़े लिखे सफेदपोशों से करना चाहते हैं !

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सवर्ण और दलित

सवर्ण और दलित
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लिखना तो बहुत कुछ चाहता हूं लेकिन कुछ बातें। 65 हजार वेतन और 8 बीघा जमीन वाला सवर्ण गरीब है। जबकि भारत में 7% से कम लोग ही इतना कमाते हैं। लगभग 10% या उससे भी कम की संख्या परन्तु भारत के 95% सभी ताकतवर पदों पर सदियों से विराजमान है, वो सवर्ण है। इस देश में हजारों विश्विद्यालय हैं। लेकिन विरले ही आपको कोई दलित इनका प्रिंसिपल, वाईस चांसलर इत्यादि मिलेगा। स्वर्ण वह है जो एक कमजोर के मूँछ रखने पर उसकी टांग तोड़ देता है, उसके घर की औरतों के साथ वाहियात हरकतें करता है, शादी में घोड़ी चढ़ने पर उसके परिवार का जीना हराम कर देता है।

सवर्ण अभागा है, से बड़ा कटाक्ष नहीं हो सकता। समय की धुरी है,चल रही है, सब बदलेगा। और पढ़ा लिखा सवर्ण तो वह है जो अखबार में इश्तिहार देता है कि मुझे वर या वधू फलाना जाति और गोत्र की चाहिए। जो लोग इस तरह की बातें लिखते हैं वो न्यूजपेपर ठीक से नहीं पढ़ते। या पढ़ते हैं पर नजर नहीं आता, या नजर देना नहीं चाहते। हर दिन का अखबार कम से कम 2 अपराध लेकर निकलता है जो तथाकथित सवर्ण ने दलित, गरीब के खिलाफ किया होता है।

यदि हम सच में इंसान हैं तो, इंसान की नजर से हर वाक्या देखें।

मैं यह सब लिखता हूँ क्योंकि मेरा मानना है कि यदि आपमें समझ है, परख है तो आप भी लिखिये। इसका कतई यह मतलब न निकालिये की मैं किसी जाति या सम्प्रदाय विशेष से मन मैला रखता हूँ। मेरे सभी मित्र जानते हैं कि मैं कौन हूँ और कैसा हूँ।

जिस विषय पर मैं लिखता हूँ, महत्वपूर्ण वह विषय है। मैं गौण हूँ, सन्देश मुखर है। मुझे XYZ समझिये, और पढ़िये की XYZ, न जिसकी कोई जाति है, न धर्म, वह बस एक निर्जीव संदेशवाहक है, ने ऐसा लिखा है। फिर आपको मजा आयेगा और शायद विद्वेष या भ्रम नहीं होगा।

यदि फिर भी आपको मेरी लिखी बातें पसन्द नहीं आती, समझ नहीं आती, तो मुझसे नजर फेर लें। तत्काल मुझे अनफॉलो करिये, हटाईये। क्योंकि मैं भी कुछ हद्द तक कंगना रनौत जैसा हूँ। वो लगातार बोलती हैं। मैं लिखता हूँ। और अच्छी बात यह है कि मैं कोई नशा भी नहीं करता। बस मेरी जितनी समझ है उतना सच लिखने, सुनने और सुधार करने की ललक और जुनून है। मेरी कर्मभूमि अलग है। मेरी तर्कभूमि अलग है। स्वागत है आपका। अच्छा ही लगूँगा। देर सवेर !

: अरुण भारती”चिंतित”

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“आश्रम” सीरीज

#Ashram Series on MXPlayer

आश्रम सीरीज में बॉबी देओल काशीपुर वाले बाबा के टाइटल रोल में हैं। बॉबी देओल ने जबरदस्त आकर्षण शक्ति वाला रोल किया है।

उनका साथ दिया है, चंदन सान्याल ने, भोपा का रोल करके। चंदन सान्याल इतने जबरदस्त कलाकार हैं कि वो उस पंक्ति में बैठने लायक हैं जहाँ मनोज वाजपेयी, पंकज त्रिपाठी और नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी जैसे लोग हैं। काश! ये गैंग्स ऑफ वासेपुर में होते। मजा आ जाता।

साथ के सभी कलाकारों ने जबरदस्त अभिनय किया है। त्रिधा चौधरी, दर्शन कुमार, तुषार पांडे, अदिति सुधीर पोहनकर, अनुप्रिया गोयनका और सचिन श्रॉफ इत्यादि ने अपने किरदार में जान डाल दी है।

आश्रम अंधविश्वास, जाति वाद से सताए लोगों को अपने जद में लेता है। और फिर उनके जीवन का कायापलट हो जाता है।

आश्रम एक तरह से आसाराम और राम रहीम के तरह के बाबाओं के रूप में अपराधियों के मायाजाल का आईना है।

भक्त अक्सर मासूम और मूर्ख होते हैं। मूर्ख को सम्पूर्ण विनाश के बाद ही समझ आता है कि उसने गलत आदमी की भक्ति की। तब तक उसका सब कुछ लूट गया होता है। और उसकी जद में जो भी आता है, उसका भी सब कुछ बर्बाद होता है।

आश्रम में कैसे एक अपराधी अपने को सबका कल्याण करता हुआ बाबा काशीपुर वाला बनता है। कैसे वो मासूम पर अपना शिकंजा कसता है। कैसे औरतों और लड़कियों को नशा खिलाकर और भरम जाल में डालकर अपनी हवस का शिकार बनाता है। इसमें यह सब दिखाया गया है।

हर आसाराम और आश्रम कि एक झलक है इसमें !

जरूर देखें !

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