रामधारी सिंह “दिनकर” की कवितायेँ

लोहे के पेड़ हरे होंगे

लोहे के पेड़ हरे होंगे,
तू गान प्रेम का गाता चल,
नम होगी यह मिट्टी ज़रूर,
आँसू के कण बरसाता चल।

सिसकियों और चीत्कारों से,
जितना भी हो आकाश भरा,
कंकालों क हो ढेर,
खप्परों से चाहे हो पटी धरा ।

आशा के स्वर का भार,
पवन को लेकिन, लेना ही होगा,
जीवित सपनों के लिए मार्ग
मुर्दों को देना ही होगा।

रंगो के सातों घट उँड़ेल,
यह अँधियारी रँग जायेगी,
ऊषा को सत्य बनाने को
जावक नभ पर छितराता चल।

आदर्शों से आदर्श भिड़े,
प्रज्ञा प्रज्ञा पर टूट रही।
प्रतिमा प्रतिमा से लड़ती है,
धरती की किस्मत फूट रही।

आवर्तों का है विषम जाल,
निरुपाय बुद्धि चकराती है,
विज्ञान-यान पर चढी हुई
सभ्यता डूबने जाती है।

जब-जब मस्तिष्क जयी होता,
संसार ज्ञान से चलता है,
शीतलता की है राह हृदय,
तू यह संवाद सुनाता चल।

सूरज है जग का बुझा-बुझा,
चन्द्रमा मलिन-सा लगता है,
सब की कोशिश बेकार हुई,
आलोक न इनका जगता है,

इन मलिन ग्रहों के प्राणों में
कोई नवीन आभा भर दे,
जादूगर! अपने दर्पण पर
घिसकर इनको ताजा कर दे।

दीपक के जलते प्राण,
दिवाली तभी सुहावन होती है,
रोशनी जगत् को देने को
अपनी अस्थियाँ जलाता चल।

क्या उन्हें देख विस्मित होना,
जो हैं अलमस्त बहारों में,
फूलों को जो हैं गूँथ रहे
सोने-चाँदी के तारों में।

मानवता का तू विप्र!
गन्ध-छाया का आदि पुजारी है,
वेदना-पुत्र! तू तो केवल
जलने भर का अधिकारी है।

ले बड़ी खुशी से उठा,
सरोवर में जो हँसता चाँद मिले,
दर्पण में रचकर फूल,
मगर उस का भी मोल चुकाता चल।

काया की कितनी धूम-धाम!

दो रोज चमक बुझ जाती है;
छाया पीती पीयुष,
मृत्यु के उपर ध्वजा उड़ाती है ।

लेने दे जग को उसे,
ताल पर जो कलहंस मचलता है,
तेरा मराल जल के दर्पण
में नीचे-नीचे चलता है।

कनकाभ धूल झर जाएगी,
वे रंग कभी उड़ जाएँगे,
सौरभ है केवल सार, उसे
तू सब के लिए जुगाता चल।

क्या अपनी उन से होड़,
अमरता की जिनको पहचान नहीं,
छाया से परिचय नहीं,
गन्ध के जग का जिन को ज्ञान नहीं?

जो चतुर चाँद का रस निचोड़
प्यालों में ढाला करते हैं,
भट्ठियाँ चढाकर फूलों से
जो इत्र निकाला करते हैं।

ये भी जाएँगे कभी, मगर,
आधी मनुष्यतावालों पर,
जैसे मुसकाता आया है,
वैसे अब भी मुसकाता चल।

सभ्यता-अंग पर क्षत कराल,
यह अर्थ-मानवों का बल है,
हम रोकर भरते उसे,
हमारी आँखों में गंगाजल है।

शूली पर चढ़ा मसीहा को

वे फूल नहीं समाते हैं
हम शव को जीवित करने को
छायापुर में ले जाते हैं।

भींगी चाँदनियों में जीता,
जो कठिन धूप में मरता है,
उजियाली से पीड़ित नर के
मन में गोधूलि बसाता चल।

यह देख नयी लीला उनकी,
फिर उनने बड़ा कमाल किया,
गाँधी के लोहू से सारे,
भारत-सागर को लाल किया।

जो उठे राम, जो उठे कृष्ण,
भारत की मिट्टी रोती है,
क्या हुआ कि प्यारे गाँधी की
यह लाश न जिन्दा होती है?

तलवार मारती जिन्हें,
बाँसुरी उन्हें नया जीवन देती,
जीवनी-शक्ति के अभिमानी!
यह भी कमाल दिखलाता चल।

धरती के भाग हरे होंगे,
भारती अमृत बरसाएगी,
दिन की कराल दाहकता पर
चाँदनी सुशीतल छाएगी।

ज्वालामुखियों के कण्ठों में
कलकण्ठी का आसन होगा,
जलदों से लदा गगन होगा,
फूलों से भरा भुवन होगा।

बेजान, यन्त्र-विरचित गूँगी,

मूर्त्तियाँ एक दिन बोलेंगी,
मुँह खोल-खोल सब के भीतर
शिल्पी! तू जीभ बिठाता चल।

लोहे के पेड़ हरे होंगे,
तू गान प्रेम का गाता चल.

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वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नही है
थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नही है

चिन्गारी बन गयी लहू की बून्द गिरी जो पग से
चमक रहे पीछे मुड देखो चरण-चिनह जगमग से
बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नही है
थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नही है

अपनी हड्डी की मशाल से हृदय चीरते तम का,
सारी रात चले तुम दुख झेलते कुलिश का।
एक खेय है शेष, किसी विध पार उसे कर जाओ;
वह देखो, उस पार चमकता है मन्दिर प्रियतम का।
आकर इतना पास फिरे, वह सच्चा शूर नहीं है;
थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।

दिशा दीप्त हो उठी प्राप्त कर पुण्य-प्रकाश तुम्हारा,
लिखा जा चुका अनल-अक्षरों में इतिहास तुम्हारा।
जिस मिट्टी ने लहू पिया, वह फूल खिलाएगी ही,
अम्बर पर घन बन छाएगा ही उच्छ्वास तुम्हारा।
और अधिक ले जाँच, देवता इतन क्रूर नहीं है।
थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।

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रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव है ।
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है ।

जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?
मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते ।
और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी
चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।

आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का
आज उठता और कल फिर फूट जाता है ।
किन्तु, फिर भी धन्य ठहरा आदमी ही तो
बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है ।

मैं न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली,
देख फिर से चाँद! मुझको जानता है तू?
स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी,
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?

मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,
आग में उसको गला लोहा बनाता हूँ ।
और उस पर नींव रखता हूँ नये घर की,
इस तरह दीवार फौलादी उठाता हूँ ।

मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी
कल्पना की जीभ में भी धार होती है ।
वाण ही होते विचारों के नहीं केवल,
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।

स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे
रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे ।
रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे

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किसको नमन करूँ मैं भारत

तुझको या तेरे नदीश, गिरि, वन को नमन करूँ, मैं ?
मेरे प्यारे देश ! देह या मन को नमन करूँ मैं ?
किसको नमन करूँ मैं भारत ? किसको नमन करूँ मैं ?

भू के मानचित्र पर अंकित त्रिभुज, यही क्या तू है ?
नर के नभश्चरण की दृढ़ कल्पना नहीं क्या तू है ?
भेदों का ज्ञाता, निगूढ़ताओं का चिर ज्ञानी है
मेरे प्यारे देश ! नहीं तू पत्थर है, पानी है
जड़ताओं में छिपे किसी चेतन को नमन करूँ मैं ?

भारत नहीं स्थान का वाचक, गुण विशेष नर का है
एक देश का नहीं, शील यह भूमंडल भर का है
जहाँ कहीं एकता अखंडित, जहाँ प्रेम का स्वर है
देश-देश में वहाँ खड़ा भारत जीवित भास्कर है
निखिल विश्व को जन्मभूमि-वंदन को नमन करूँ मैं !

खंडित है यह मही शैल से, सरिता से सागर से
पर, जब भी दो हाथ निकल मिलते आ द्वीपांतर से
तब खाई को पाट शून्य में महामोद मचता है
दो द्वीपों के बीच सेतु यह भारत ही रचता है
मंगलमय यह महासेतु-बंधन को नमन करूँ मैं !

दो हृदय के तार जहाँ भी जो जन जोड़ रहे हैं
मित्र-भाव की ओर विश्व की गति को मोड़ रहे हैं
घोल रहे हैं जो जीवन-सरिता में प्रेम-रसायन
खोर रहे हैं देश-देश के बीच मुँदे वातायन
आत्मबंधु कहकर ऐसे जन-जन को नमन करूँ मैं !

उठे जहाँ भी घोष शांति का, भारत, स्वर तेरा है
धर्म-दीप हो जिसके भी कर में वह नर तेरा है
तेरा है वह वीर, सत्य पर जो अड़ने आता है
किसी न्याय के लिए प्राण अर्पित करने जाता है
मानवता के इस ललाट-वंदन को नमन करूँ मैं !

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गीत, अगीत, कौन सुंदर है?

गाकर गीत विरह की तटिनी
वेगवती बहती जाती है,
दिल हलका कर लेने को
उपलों से कुछ कहती जाती है।
तट पर एक गुलाब सोचता,
“देते स्*वर यदि मुझे विधाता,
अपने पतझर के सपनों का
मैं भी जग को गीत सुनाता।”

गा-गाकर बह रही निर्झरी,
पाटल मूक खड़ा तट पर है।
गीत, अगीत, कौन सुंदर है?

बैठा शुक उस घनी डाल पर
जो खोंते पर छाया देती।
पंख फुला नीचे खोंते में
शुकी बैठ अंडे है सेती।
गाता शुक जब किरण वसंती
छूती अंग पर्ण से छनकर।
किंतु, शुकी के गीत उमड़कर
रह जाते स्*नेह में सनकर।

गूँज रहा शुक का स्*वर वन में,
फूला मग्*न शुकी का पर है।
गीत, अगीत, कौन सुंदर है?

दो प्रेमी हैं यहाँ, एक जब
बड़े साँझ आल्*हा गाता है,
पहला स्*वर उसकी राधा को
घर से यहाँ खींच लाता है।
चोरी-चोरी खड़ी नीम की
छाया में छिपकर सुनती है,
‘हुई न क्*यों मैं कड़ी गीत की
बिधना’, यों मन में गुनती है।

वह गाता, पर किसी वेग से
फूल रहा इसका अंतर है।
गीत, अगीत, कौन सुन्*दर है?

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विवशता

कल तुम फिर मेरे सपनो में आई थी,

मेरी आँखों में विवशता,तुम्हारी आँखों में रुलाई थी.
काश,समाज के विष को पी लिए होते,
अपने सपनो को उस पल को जी लिए होते.
ना अपने घर आज तुम उदास होती,
ना मैं उदास होता.
सूरज के जलने से पहले और बुझने के बाद तक,
हम तुम संग तल्लीन होते,
मुझे श्रृष्टि पर ऐतवार होता.
—अरुण भारती ‘चिंतित’

Indian democracy and Aam Admi

The good thing about Indian democracy is that,If you are terrorist who has killed hundreds of innocent people, You will be guest, feast on biryani,get prosecutor without paying a penny,have several human right activists,NGOs,Scholars defending your right of clemency.

But If you are honest and innocent citizen, you pay tax,get looted,get fooled by bureaucrats and politicians and judicial system.Criminals intimidate you,police arrests you in false case,you might get killed in cold blooded encounter,You get arrested for false cases, all your savings exhaust but you do not get a bail.Rather you will land up in jail serving life imprisonment or death.This time no one will support or fight for clemency,mercy.Media will shout,Hang him ! hang him !

I salute this democracy.But I would prefer to be Nalini, Masood Azhar,Ansari,Kasab,Telgi,Kalmadi,R.K Sharma,Lalu,Sahabbudin,Jayalalita and Anonymous.

I would not be Anna because he can fast for numerous day, I could not for a single day.I could not be happy wearing simple dhoti kurta and cap.I can not be Kejriwal because I can not sleep the way he sleeps on railway platform,the way he fights the parliament and still do not fear no one.

I am aam admi.I fear all.But I see hope in the above said convicted.If I am one of them,people are there for me. I choose the easiest way.When my impulse of honesty exhausts,which will, I might choose to be Kasab than Anna !

On Independence Day

हमारे पूज्य स्वतंत्रता सेनानियों भले ही आप शर्मसार हों अपनी जननी के वर्तमान हालात पे जहाँ चोर और कातिल और ज़ालिम हमारा भविष्य तय करते हैं.हम स्वाधीन हैं.हम आपके बलिदान को नमन करते हैं.और आज के हालात का धिक्कार करते हैं.आशा है जल्द ही सद बुद्धि आये, लोग जागें,और ये चोर उचक्के देश छोड़ कर नरक को भागें.

(Holy-Devil)

Good,Bad & Diplomatic

In this world ,choose who you want to be.To yourself and to others.You can be good or bad.You can be diplomatic.Being diplomatic makes others happy but your soul gets cheated.Your conscience cries.Being good or bad makes people happy or offended.Choose the easy way or difficult one. Stand for what you are and what you want to be.

You can be hard or soft.Being hard is a difficult path. People hate you.Being soft is easy. People like you.Choose what you want to be. You can not be both hard and soft at the same time.People will missunderstood you.Being not understood of your intentions are painful.

You are born alone.You die alone. In between these two events you make family,friends,foes.You can leave a mark on the sand of time.People will follow your path and will quote in examples. You can leave scar.

Make you path which is visible to millions. Choose to be a person who could instill life in oppressed and marginalized.

Be grateful to God that he made you rational.Don’t get involved in pitty equations of the world.Listen to what you soul says.

Be  a looser but win your soul. Be Good or Bad but not diplomatic. Difficult paths are traveled by a few who make history,who force time to have a look at their deeds.

By: Holy-Devil

May be I will smile.

When ever I go to my village I find people doing so many hardship to feed themselves. There are millions of problems to be solved.Nitish ji has created hope but most are on the paper.I  get saddened due to misery prevailing there.Staying there is not a smooth ride.Here in metros I find convenience,luxury and comfort and for one week i feel guilt and disgust.It fades away gradually but again freshen up when I revisit. My corporate life is smooth but taking toll on my emotional strength.

May be I am being tested and soon will choose the correct path. I would choose the path,the career that will touch the lives of so many people, that will touch my soul, that will give me ultimate happiness and satisfaction.

Every journey to my place raises so many questions to me.

Am I doing justice to myself being a responsible and sensible citizen.Am I doing something for the people who have prayed for my success.Am I doing the favor to my Love who is so genuine and natural compared to the fabricated dramatic girl of metros.

May be one day I will answer all these questions.May be I will rise for the occasion.May be I will go The Gautam Buddha way as I think life is so fragile and everything is so mortal.

May be I will give the ultimate happiness to my soul. May be I will feel truly proud of being original.May be i will fulfill the hope of the millions.

May be I will smile in true sense and sensibility.

Holy~Devil

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