लाश पर होली न खेलो

हे मनु,विद्या बुद्धि में तुम सबसे श्रेष्ठ हो.
प्रभु के भी पुत्र तुम तो ज्येष्ठ हो.
सभ्य तुम हो,सभ्यता का लाज रख लो.
श्रेष्ठ तुम हो,श्रेष्ठ भी समाज रख लो.
छोड़ दो सब स्वार्थ,सब जीवों को संभव प्यार दो.
लाश पर होली न खेलो,सम्मान का अधिकार दो.
मैं हर उस नस में बसा,जिसपर तुम्हारी धार चली.
मैं हूँ कायल प्यार का,पर तुम चले अपनी गली.
— अरुण भारती ‘चिंतित’

मेरे मन में रावण बसते, बसते मन में राम हैं.

मेरे मन में रावण बसते, बसते मन में राम हैं.
अक्सर दोनों लड़ते रहते,लड़ना इनका काम है.
राम जी जब हारते हैं,मन में क्रंदन होता है.
रावण जब भी हारता,घनघोर गर्जन होता है.

मेरा मन निर्झर की भाती,अबाध गति से चलता है.
रामजी धक्का खाते रहते,रावण मंद मंद हँसता है.
हर तरफ रावण ही रावण,राम जी अल्पसंख्यक हैं.
राम जी हारे रावण जीते, ये संकट का सूचक है.

रावण का अट्टहास देख कर, चिंतित जी घबराते हैं.
इस विजय दिवस पर लो भैया, मन में भी आग लगाते हैं.

—————— अरुण भारती ‘चिंतित’


एक तरफ मतवाली तुम हो

एक तरफ मतवाली तुम हो

एक तरफ दारू की बोतल,एक तरफ मतवाली तुम हो.

एक तरफ है चखना चटपट, एक तरफ रसवाली तुम हो.
एक तरफ अंगूरी रस है, एक तरफ गुलाबी तुम हो.
एक तरफ तीखी सांसे हैं, एक तरफ कस्तूरी तुम हो.
एक तरफ बोतल की घनघन,एक तरफ पायल की छनछन.
एक तरफ पैग की झंझट, एक तरफ सागर बिन तट.
एक तरफ बदसूरत बोतल,एक तरफ सुडौल बदन तुम.
एक तरफ फूहड़ गाने हैं, एक तरफ मीठी कोयल तुम.
एक तरफ गन्दा मदिरालय, नख-शिख तक तुम शीशमहल हो.
एक तरफ मटमैली चादर, अंग अंग से तुम मखमल हो.
कौन भला मदिरालय जाये,पैसे की अब बली चढ़ाये.
अधरों से अब छू लेने दो,नैनों से अब पी लेने दो.
अंकपाश में बांध लो,पल में सदियाँ जी लेने दो.
इस नशे से चिंतित जी जीवन भर पार न पाएंगे.
जग से वैरागी होकर,तुम्हरे मदिरालय आयेंगे.
—– अरुण भारती ‘चिंतित’

अच्छी लगती हो

अच्छी लगती हो

सावन की रिमझिम में
भींगे गेशुं लिए
अल्हड अदाओं से
जब इतराती हो तुम
अच्छी लगती हो.
पंकज नयनों से मुस्कुराकर
रेशम सी लटों को
यूँ चेहरे पर गिराकर
अपनी कस्तूरी सांसों से
जब मदहोश करती हो तुम
अच्छी लगती हो.
दुपट्टे के कोने को
होठों से दबा
कनखियों से देख
जब मुस्कुराती हो तुम
अच्छी लगती हो.
जब मैं देखता हूँ तुम्हे
यह देखकर शरमाते हुवे
दुपट्टे का पल्लू
जब ठीक करती हो तुम
अच्छी लगती हो.
चांदनी रातों में
जब छत पर मुझे
चुपके से बुलाती हो तुम
बहुत अच्छी लगती हो.
————-अरुण भारती ‘चिंतित’
# written in period of “ANALOG ELECTRONIC Circuits class (20 October  2005 )

चिंतित

एक तरफ है घोर गरीबी,एक तरफ अय्याशी है.
हत्यारे स्वछन्द घूम रहे, निर्दोष को मिलती फांसी है.
महंगाई का  आलम ये है, नमक मिर्च को पैसे कम हैं.
हे माते कैसा जनतंत्र है,ज्यादा लगता भेड़ तंत्र है.
जनता के सेवक कहकर ये अपनी पूजा करते हैं,
संसद के गलियारे में दम्भी गर्जना भरते हैं.
वसुधा है प्रलाप कर रही अपनी इस लाचारी पर,
चिंतित चिंतामग्न सोचते, जारी विपदा भारी पर.

————-अरुण भारती ‘चिंतित’

काका हाथरसी की कवितायेँ

पुलिस-महिमा

पड़ा – पड़ा क्या कर रहा , रे मूरख नादान
दर्पण रख कर सामने , निज स्वरूप पहचान
निज स्वरूप पह्चान , नुमाइश मेले वाले
झुक – झुक करें सलाम , खोमचे – ठेले वाले
कहँ ‘ काका ‘ कवि , सब्ज़ी – मेवा और इमरती
चरना चाहे मुफ़्त , पुलिस में हो जा भरती

कोतवाल बन जाये तो , हो जाये कल्यान
मानव की तो क्या चले , डर जाये भगवान
डर जाये भगवान , बनाओ मूँछे ऐसीं
इँठी हुईं , जनरल अयूब रखते हैं जैसीं
कहँ ‘ काका ‘, जिस समय करोगे धारण वर्दी
ख़ुद आ जाये ऐंठ – अकड़ – सख़्ती – बेदर्दी

शान – मान – व्यक्तित्व का करना चाहो विकास
गाली देने का करो , नित नियमित अभ्यास
नित नियमित अभ्यास , कंठ को कड़क बनाओ
बेगुनाह को चोर , चोर को शाह बताओ
‘ काका ‘, सीखो रंग – ढंग पीने – खाने के
‘ रिश्वत लेना पाप ‘ लिखा बाहर थाने के.

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भ्रष्टाचार

राशन की दुकान पर, देख भयंकर भीर
‘क्यू’ में धक्का मारकर, पहुँच गये बलवीर
पहुँच गये बलवीर, ले लिया नंबर पहिला
खड़े रह गये निर्बल, बूढ़े, बच्चे, महिला
कहँ ‘काका’ कवि, करके बंद धरम का काँटा
लाला बोले – भागो, खत्म हो गया आटा.

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हिंदी की दुर्दशा

बटुकदत्त से कह रहे, लटुकदत्त आचार्य
सुना? रूस में हो गई है हिंदी अनिवार्य
है हिंदी अनिवार्य, राष्ट्रभाषा के चाचा-
बनने वालों के मुँह पर क्या पड़ा तमाचा
कहँ ‘ काका ‘ , जो ऐश कर रहे रजधानी में
नहीं डूब सकते क्या चुल्लू भर पानी में

पुत्र छदम्मीलाल से, बोले श्री मनहूस
हिंदी पढ़नी होये तो, जाओ बेटे रूस
जाओ बेटे रूस, भली आई आज़ादी
इंग्लिश रानी हुई हिंद में, हिंदी बाँदी
कहँ ‘ काका ‘ कविराय, ध्येय को भेजो लानत
अवसरवादी बनो, स्वार्थ की करो वक़ालत.

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घूस माहात्म्य

कभी घूस खाई नहीं, किया न भ्रष्टाचार
ऐसे भोंदू जीव को बार-बार धिक्कार
बार-बार धिक्कार, व्यर्थ है वह व्यापारी
माल तोलते समय न जिसने डंडी मारी
कहँ ‘काका’, क्या नाम पायेगा ऐसा बंदा
जिसने किसी संस्था का, न पचाया चंदा

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