विकास की लाश ——————— पैदा होना था विकास को, रहना था उसे स्मार्ट सिटी में, चलना था उसे बूलेट ट्रेन में, पेट्रोल उसको 40 का चाहिये था, डॉलर में 40 रुपया चाहिये था, रहना था उसे राम राज्य में, उसे मुस्लिमों और भीमटो का, कत्लेआम भी करना था ।
कल उसकी लाश को, मैंने गंगा नदी में तैरते देखा, नदी के किनारे तीन गिद्ध थे, एक कि दाढ़ी थी, एक मोटा था, एक मनहूस और गंजा था ।
विकास पैदा तो हुआ, लेकिन उसकी बहती लाश मिली, न उसे श्मशान मिला, और न मिला कब्रिस्तान ।
मुझे याद है जब, उसके रिश्तेदारों ने, हर हर, घर घर, का नारा बुलंद किया था, उसी नारे के शोर में, उसने दम तोड़ दिया ।
विकास के रिश्तेदार, स्तब्ध हैं, दुःखी हैं, दोष किसे दें? हर हर, घर घर में, कोई दोष तो है नहीं,
इस अक्षम्य अपराध का, भागी कौन? अपराधी कौन? कौन है वो नरपिशाच, जिसने लील लिया, उसके विकास को?