नफ़रत का सौदागर

मैं धार्मिक नफरत का सौदागर हूँ

मुझे इंसानों में ही,

अपनी खेती दिखती है।

इंसानी खून को,

मैं सीढ़ी बनाकर

इतना ऊपर पहुँच जाता हूँ,

जहाँ उनकी रुदन सुनाई नहीं देती है।

मेरे संबल हैं वो करोड़ो लोग,

जो उतने ही नफरती

और जहरीले हैं।

मैं एक धर्मयुद्ध लड़ रहा हूँ

मेरी नफरत ही मेरा नश्तर है।

— Bihari Chaupal

भटकना

रास्ता भटकना भी जरूरी है,
औकात का पता चलता है,
अपने और दूसरों के,
जज़्बात का पता चलता है।

मंज़िल पहले मिल जाती है,
अपने अंदर के डर और हिम्मत से,
और रूबरू हो जाते हैं,
अपने को थोड़ा और मजबूत पाते है।

जो सोचा नहीं था, वो हो जाता है,
इंसान अपने को बेहतर पाता है।

भटकने से कभी घबराना नहीं,
नए मोड़ लेने से कतराना नहीं,
भटकर भी मंजिल जल्दी पाओगे,
जीवन में नए नए मुकाम बनाओगे।

: बिहारी चौपाल

महाकुंभ- प्रयागराज

भीड़ में कुचल कुचल कर,
सैकड़ों लोग मरते रहेंगे।

कुंभ मेला के नाम पर,
नेता राजनीति करते रहेंगे।

हिंदुओ को बरगलाना है,
कुर्सी बार बार हथियाना है।

इस पल वो तुम्हे सांत्वना देंगें,
अगले ही पल उत्सव मनाएँगे।

हजारों किलोमीटर चलकर
मजदूर लोग मरते रहेंगें ।

मोदी योगी नए उत्सव की,
अपनी नौटंकी करते रहेंगे।

ट्रेन में एक्सीडेंट होता रहेगा,
एयरपोर्ट पर कैनोपी गिरती रहेगी,

हज़ार करोड़ का पुल गिरते रहेगा,
मैं और तुम ऐसे ही मरते रहेंगें ।

लेकिन तुम वोट इनको ही देना,
क्यूंकि हिंदू धर्म बचाना है,

गंदे गंगा में डुबकी लगाना है,
भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना है।

साल का ₹2000 अकाउंट में आना है,
5 किलो राशन का थैला पाना है ।

: बिहारी चौपाल

कटेंगे तो बटेंगे

वो तुम्हें अलग अलग,
नारों में उलझा रहा है,
और अपनी नाकामियों को,
बहाने से झुठला रहा है।

उसे बस तुम्हें ग़रीबी और,
जीवन के संघर्ष में उलझाना है,
धर्म के कट्टरवाद में,
एक दूसरे को लड़ाना है।

उसे बस कुर्सी पाना है,
नए झूठ का जुगाड़ लगाना है
और अपने अमीर दोस्तों का ,
लाखों करोड़ माफ करवाना है ।

इतने में ही उसकी कहानी है,
झूठ और नफ़रत ही दाना पानी है ।

: बिहारी चौपाल

भरे पड़े अख़बार हैं

जाति आधारित हत्या से,
भरे पड़े अख़बार हैं,
फिर भी ज़ालिम कहता है,
हिंदू एकाकार है।

मंदिर में प्रवेश नहीं है,
खाने में छुआछूत है,
शादी में भी जाति का,
देखने का भूत है।

तीस हज़ार तो जाति हैं,
अलग अलग तो माटी है।

पूरब पश्चिम अलग अलग हैं,
उतर दक्षिण अगल बगल हैं,
इतना देश विशाल हैं,
अलग अलग बोलचाल है।

जो हम सबको बांटें है,
वही तो हमको काटे है।

फिर भी कहता एक रहो,
गजब का ये व्यवहार है।

एक हाथ में तलवार है,
दूसरे में खूनी झंडा है।

अच्छा ये व्यापार है,
एकता का प्रचार है ।

: बिहारी चौपाल

विकास कि लाश

विकास की लाश
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पैदा होना था विकास को,
रहना था उसे स्मार्ट सिटी में,
चलना था उसे बूलेट ट्रेन में,
पेट्रोल उसको 40 का चाहिये था,
डॉलर में 40 रुपया चाहिये था,
रहना था उसे राम राज्य में,
उसे मुस्लिमों और भीमटो का,
कत्लेआम भी करना था ।

कल उसकी लाश को,
मैंने गंगा नदी में तैरते देखा,
नदी के किनारे तीन गिद्ध थे,
एक कि दाढ़ी थी, एक मोटा था,
एक मनहूस और गंजा था ।

विकास पैदा तो हुआ,
लेकिन उसकी बहती लाश मिली,
न उसे श्मशान मिला,
और न मिला कब्रिस्तान ।

मुझे याद है जब,
उसके रिश्तेदारों ने,
हर हर, घर घर,
का नारा बुलंद किया था,
उसी नारे के शोर में,
उसने दम तोड़ दिया ।

विकास के रिश्तेदार,
स्तब्ध हैं, दुःखी हैं,
दोष किसे दें?
हर हर, घर घर में,
कोई दोष तो है नहीं,

इस अक्षम्य अपराध का,
भागी कौन? अपराधी कौन?
कौन है वो नरपिशाच,
जिसने लील लिया,
उसके विकास को?

©बिहारी चौपाल

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