जाति आधारित हत्या से,
भरे पड़े अख़बार हैं,
फिर भी ज़ालिम कहता है,
हिंदू एकाकार है।
मंदिर में प्रवेश नहीं है,
खाने में छुआछूत है,
शादी में भी जाति का,
देखने का भूत है।
तीस हज़ार तो जाति हैं,
अलग अलग तो माटी है।
पूरब पश्चिम अलग अलग हैं,
उतर दक्षिण अगल बगल हैं,
इतना देश विशाल हैं,
अलग अलग बोलचाल है।
जो हम सबको बांटें है,
वही तो हमको काटे है।
फिर भी कहता एक रहो,
गजब का ये व्यवहार है।
एक हाथ में तलवार है,
दूसरे में खूनी झंडा है।
अच्छा ये व्यापार है,
एकता का प्रचार है ।
: बिहारी चौपाल
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