क्यूं विचलित कर जाती हो,
जब एकाग्रचित्त हो,
मैं स्वप्न बुनता,
प्रेमपथिक बन जाने का,
या जग को सुखद बनाने का,
इस भँवर जाल में तुमको ढूंढता,
या फिर जग की तृष्णा को !
@अरुण भारती”चिंतित”
मैं तीख़े सवाल करता हूँ!
क्यूं विचलित कर जाती हो,
जब एकाग्रचित्त हो,
मैं स्वप्न बुनता,
प्रेमपथिक बन जाने का,
या जग को सुखद बनाने का,
इस भँवर जाल में तुमको ढूंढता,
या फिर जग की तृष्णा को !
@अरुण भारती”चिंतित”
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