हे मनु,विद्या बुद्धि में तुम सबसे श्रेष्ठ हो.
प्रभु के भी पुत्र तुम तो ज्येष्ठ हो.
सभ्य तुम हो,सभ्यता का लाज रख लो.
श्रेष्ठ तुम हो,श्रेष्ठ भी समाज रख लो.
छोड़ दो सब स्वार्थ,सब जीवों को संभव प्यार दो.
लाश पर होली न खेलो,सम्मान का अधिकार दो.
मैं हर उस नस में बसा,जिसपर तुम्हारी धार चली.
मैं हूँ कायल प्यार का,पर तुम चले अपनी गली.
— अरुण भारती ‘चिंतित’
Manu ko awaj de rahe ho…manuptra to kho chuka hai!
LikeLike