चिंतित

एक तरफ है घोर गरीबी,एक तरफ अय्याशी है.
हत्यारे स्वछन्द घूम रहे, निर्दोष को मिलती फांसी है.
महंगाई का  आलम ये है, नमक मिर्च को पैसे कम हैं.
हे माते कैसा जनतंत्र है,ज्यादा लगता भेड़ तंत्र है.
जनता के सेवक कहकर ये अपनी पूजा करते हैं,
संसद के गलियारे में दम्भी गर्जना भरते हैं.
वसुधा है प्रलाप कर रही अपनी इस लाचारी पर,
चिंतित चिंतामग्न सोचते, जारी विपदा भारी पर.

————-अरुण भारती ‘चिंतित’

3 thoughts on “चिंतित

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  1. वसुधा है प्रलाप कर रही अपनी इस लाचारी पर,
    चिंतित चिंतामग्न सोचते, जारी विपदा भारी पर.

    I just love these lines….Bahut sunder Holi Devil!

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