एक तरफ है घोर गरीबी,एक तरफ अय्याशी है.
हत्यारे स्वछन्द घूम रहे, निर्दोष को मिलती फांसी है.
महंगाई का आलम ये है, नमक मिर्च को पैसे कम हैं.
हे माते कैसा जनतंत्र है,ज्यादा लगता भेड़ तंत्र है.
जनता के सेवक कहकर ये अपनी पूजा करते हैं,
संसद के गलियारे में दम्भी गर्जना भरते हैं.
वसुधा है प्रलाप कर रही अपनी इस लाचारी पर,
चिंतित चिंतामग्न सोचते, जारी विपदा भारी पर.
————-अरुण भारती ‘चिंतित’
देश के हालत पर स्वछंद टिपण्णी बहुत खूब
LikeLike
बहुत बहुत धन्यवाद दीदी प्रोत्साहन के लिए
LikeLike
वसुधा है प्रलाप कर रही अपनी इस लाचारी पर,
चिंतित चिंतामग्न सोचते, जारी विपदा भारी पर.
I just love these lines….Bahut sunder Holi Devil!
LikeLike