कल तुम फिर मेरे सपनो में आई थी,
मेरी आँखों में विवशता,तुम्हारी आँखों में रुलाई थी.
काश,समाज के विष को पी लिए होते,
अपने सपनो को उस पल को जी लिए होते.
ना अपने घर आज तुम उदास होती,
ना मैं उदास होता.
सूरज के जलने से पहले और बुझने के बाद तक,
हम तुम संग तल्लीन होते,
मुझे श्रृष्टि पर ऐतवार होता.
—अरुण भारती ‘चिंतित’
Leave a comment