” This Poem is written by : Dushyant Kr. Chaturvedi ji who is a very famous poet.”
Some one mailed me and i posted it in column of “artice written by others” categories.
I should get applause for posting this poem but not for writing it as i have not created this.
भैंस चालीसा
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महामूर्ख दरबार में, लगा अनोखा केस
फसा हुआ है मामला, अक्ल बङी या भैंस
अक्ल बङी या भैंस, दलीलें बहुत सी आयीं
महामूर्ख दरबार की अब,देखो सुनवाई
मंगल भवन अमंगल हारी- भैंस सदा ही अकल पे भारी
भैंस मेरी जब चर आये चारा- पाँच सेर हम दूध निकारा
कोई अकल ना यह कर पावे- चारा खा कर दूध बनावे
अक्ल घास जब चरने जाये- हार जाय नर अति दुख पाये
भैंस का चारा लालू खायो- निज घरवारि सी.एम. बनवायो
तुमहू भैंस का चारा खाओ- बीवी को सी.एम. बनवाओ
मोटी अकल मन्दमति होई- मोटी भैंस दूध अति होई
अकल इश्क़ कर कर के रोये- भैंस का कोई बाँयफ्रेन्ड ना होये
अकल तो ले मोबाइल घूमे- एस.एम.एस. पा पा के झूमे
भैंस मेरी डायरेक्ट पुकारे- कबहूँ मिस्ड काल ना मारे
भैंस कभी सिगरेट ना पीती- भैंस बिना दारू के जीती
भैंस कभी ना पान चबाये – ना ही इसको ड्रग्स सुहाये
शक्तिशालिनी शाकाहारी- भैंस हमारी कितनी प्यारी
अकलमन्द को कोई ना जाने- भैंस को सारा जग पहचाने
जाकी अकल मे गोबर होये- सो इन्सान पटक सर रोये
मंगल भवन अमंगल हारी- भैंस का गोबर अकल पे भारी
भैंस मरे तो बनते जूते- अकल मरे तो पङते जूते
Credit : My Inbox
khatarnak yaar
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Thank you very much Sir.
With all due regards i must say i was not knowing about you.
Sorry and thanks again !
Holy~Devil
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to fir lijiye….
padhne ki bhi zarurat nahi padegi
aap ko suna he deta hu…
…BHAINS CHALISA…
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Your poem is very good. Main dusre ki poems ka ek alag sa forum bana rakha hai jismien “mera naam ” nahi hota.
Jisne mujhe mail kiya tha uske pass aapki puri poem nahi thi. Sorry. Puri peom ka link denege to mehrabani hogi or aapki khusi badhegi
Regards
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मित्रवर,
आपके खेत मे अपनी भैंस को देख कर मै भी इधर ही दौङा चला आया, अपनी भैंस को सम्मानित देखकर अच्छा लगा|मुझे और भी अच्छा लगता यदि आप मेरी भैंस चालीसा पूरी की पूरी पोस्ट करते|
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निशांत !
आपकी बातें एक प्राकृतिक भावनाओ का दर्शन लगती हैं .एक रचना के उत्तम होने की पहली शर्त है अपनी भावनाओ और विचारो का सम्पूर्ण उकेर अन्यथा रचना कृत्रिम हो जाती है .आपका कहना की ” हम लिख रहे हैं…की लोग हमें पढें…हमें अपने दौर से कोई सरोकार नहीं हैं….हमने भाषाएँ सीखीं हुई हैं…किताबें पढ़ी हैं…मगर कहने को कुछ नहीं…क्यूंकि हम किताबों में छपे पेड़ को ही देखकर मौसम बताने लगे हैं…लिखने के लिए न शब्द चाहिये…न विषय….कविता और रचना अन्दर से फूटती है…और यदि ऐसा हुआ तो मैं उन रचनाओं को सर्वश्रेष्ठ मानूंगा ” से मैं आंशिक रूप से सहमत हूँ.मैं अपनी अन्दर की संवेदना और सोच को एक दैनिक रूप में उकेरता हूँ.ये मेरा व्यक्तिगत अभिरुचि और संतोष अर्जित करने का माध्यम है .कुछ खास मित्रो के लिए मैं ऑनलाइन लिखना शुरू किया.दुसरे की रचना पढना अच्छी बात है पर उससे मौसम का हाल जानने की वकालत मैं नहीं करता.एक प्राकृतिक रचना का सृजन स्वयं होता है , उसके शब्द और भाव और बहाव भी साथ जन्म लेते हैं.जब भी एसी रचना का जन्म होता है वो श्रेष्ठ होती है . व्याकरण युक्त शब्द को बस एक साथ रख देने से रचना जन्म लेती तो हर कोई फनकार होता, परन्तु सचाई इससे परे है .
आप उच्च कोटि की रचना लिखने की कुव्वत रखते हैं .इसे व्यतीत समयानुसार और बेहतर करिये.समय की इस भाग दौड़ में व्यक्तिगत संतोष को बनाये रखना मुश्किल हो जाता है परन्तु असीम संतोष का एक मात्र माध्यम यही बचता है.इस दीपक का जलाये रख कर ही जिजीविसा बढती है.कुछ वादे और इरादे हैं जो पुरे करने की पुरजोर कोशिश में मग्न रहकर भी ये मशाल जलाये रखूँगा .आपसे भी ऐसी ही उम्मीद है !
सम्मान !
Holy~Devil
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अरुण जी…हमने साहित्य के नियमों और साहित्य की प्रतिबद्धता को सदैव से ही अपनी तरह मोड़ा है…दरअसल हम साहित्य नहीं लिखते….जिसे लिखते हैं उसे साहित्य कहते हैं……अंतर्भावनाओं की अभिव्यक्ति बहुत आवश्यक है….जिस प्रकार हम डाईरी लिखें,तर्क करें, बहस करें, संगीत सुनें, सिगरेट पियें..कविता लिखें..किताबें पढें…यह सब बहुत आवश्यक है क्यूंकि हम अपनी शक्ति को यदि कही रिलीज़ नहीं करेंगे तो घातक हो सकता है सभी कुछ….मगर यदि हम इस पूरी अभिव्यक्ति को बुद्धिजीविता और समझ से जोड़ दें तो बहुत अच्छा हो सकता है….हम लिख रहे हैं…की लोग हमें पढें…हमें अपने दौर से कोई सरोकार नहीं हैं….हमने भाषाएँ सीखीं हुई हैं…किताबें पढ़ी हैं…मगर कहने को कुछ नहीं…क्यूंकि हम किताबों में छपे पेड़ को ही देखकर मौसम बताने लगे हैं…लिखने के लिए न शब्द चाहिये…न विषय….कविता और रचना अन्दर से फूटती है…और यदि ऐसा हुआ तो मैं उन रचनाओं को सर्वश्रेष्ठ मानूंगा….उस रचना के लिए न आपको व्याकरण पढना है…न शब्दकोश उठाने हैं…शब्द भी जुड़ जायेंगे..कलम भी मिल जायेगी…कविता भी बन जायेगी…
Nishant kaushik
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🙂 but credit to my inbox not me
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macha diye bharti ji…..alankar wale dino ki yaad dila di [:)]
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