मेरी माँ की ममता

मेरी माँ की ममता
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वही मेरी जिंदगी हैं, वही मेरा आशियाना हैं
उनके बिना कैसा जीना कैसा मर जाना है
दीपक की तरह जलती है वो, रौशन होता है मेरा जहाँ
वही है मेरी धरती, वही है मेरा आस्मान
उनके जलने से रौशन होता हूँ मैं
उनके सुगंध से महकता हूँ मैं
उनको पौधा ख़ुद को फूल कहता हूँ मैं

अब यही एक आस है कुछ कर दिखाना है
उनके लिए बहुत जी लिया अब मर दिखाना है

रचनाकार : अरुण भारती ” घायल परिंदा “

12 thoughts on “मेरी माँ की ममता

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  1. माँ

    मैं रोऊँ तो मुझे चुप कराती हैं
    मैं रूठू तो मुझे मनाती हैं,
    हर मोड़ पर मेरा साथ देती हैं
    बस दिन में 15-20 बार डांट देती हैं.

    तुने ही तो ज़िन्दगी रची हैं
    तुझमे ही दुनिया बसी हैं,
    मेरे ग़म का आंसु तू हैं
    तू ही मेरी हर ख़ुशी हैं.

    तू डांटती हैं बेटा दुआ माँगा कर
    मैं कहती हूँ क्या फायदा वो देता तो नहीं हैं,
    पर में हर दुआ में तेरा प्यार साथ मांगती हूँ
    जो तुझे अब तक पता नहीं हैं

    ख़ुदा मुझसे सब छीन लेता हैं
    ये सोचकर में चिढ जाती हूँ
    पर मैं ख़ुदा से पहले तेरा नाम लेती हूँ
    इससे वो चिढ़ता हैं, ये सोचकर मैं शांत हो जाती हूँ……………………………………

    लव यू अम्मी

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  2. Shayad Raja aur rank ka….tum yeh line google mein dalkar check karna shayad mil jaye youtube per.

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  3. BAHUT SUNDER. maa ka chitran kitna bhi kar do kam hi par jata hai…..

    Tumhare yeh poem main kal padhi aur ise padhkar mujhe ek song yaad aaya aur kal dinbhar main yeh song sunti rahi….

    Maa tu kitni achhi hai, tu kitni bholi hai…
    pyari pyari hai…..o maa o maa
    Ke yeh jo duniya hai, yeh ban hai kaanton ka
    Tu phulwaari hai, o maa o maa, o maa, o maa
    Dukhne laagi hai maa teri aankhiyaan – 2
    Mere liye jaagi hai tu saari saari ratiyaan
    Meri nindiyaan pe apni nindiyaan bhi
    Tune maari hai, o maa o maa

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  4. aise to aapki sabhi kavitayen achchi hoti hain but ye to bahut hi achi hai kyunki ye MAAse related hai………………
    keep it up………

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  5. Kafi acha prayas hai….ek baat kehna chahunga ki kavita ki aakhiri do pantiya unexpectedly aa rahi hai….kafi achha vishay hai…isliye isase behtar ki apeksha ki ja sakti hai aapse!!!

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  6. बहुत बहुत धन्यवाद .आपकी बातों का मैं जरुर ख्याल रखूँगा .आपके जैसे बनने की कोशिश जारीहै .

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  7. अरूण भाई!
    आपने विषय ऎसा उठाया है,जिस पर कुछ कहा हीं नहीं जा सकता । उस शकित जिसे माँ कहते हैं, उसके सामने हर कोई नतमस्तक है। लेकिन जहाँ कविता की बात आती है , तो मुझे ईमानदार बनना पड़ जाता है । कविता में बहुत हीं सुधार की गुंजाईश है। आपसे नए शब्दों और बिंबों की आशा रहती है, लेकिन आपने वही जीना, मरना, दीपक ,लौ , रौशनी को रखा है।
    मुझे पता है कि आप इससे बहुत हीं अच्छा लिख सकते हैं, आपने अतीत में लिखा भी है। बस मुझे इस विषय (माँ ) पर वही पुराना अरूण चाहिए, जो तुकबंदी के मोह में पड़े बिना दिल छूने वाली पंक्तियाँ लिखता है। उम्मीद करता हूँ कि आप मेरी बात समझ रहे हैं।

    -विश्व दीपक ’तन्हा’

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